गुरुवार, 1 अगस्त 2024

सूतांजली अगस्त 2024

 



जो स्वाभाविक है वही सहज है,

                                                जो सहज है वही सरल है,

                                                                      जो सरल है वही निर्मल है

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भारतीयता क्या है?

(यहां कुछ धारणाएं हैं जो भारत की वर्तमान वास्तविकताओं के अनुरूप नहीं हो सकती हैं। यह भारत के गहरे और आंतरिक अस्तित्व के बारे में हमारी अवधारणा है जिसमें उसकी अद्वितीय प्रतिभा और उसकी उच्च संभावनाएं समाहित हैं, और हमें इस बात का विश्वास है कि हम इसे पुनः प्राप्त कर लेंगे।)

          हम प्रायः भारत के संदर्भ में भारतीयता की भी चर्चा सुनते हैं। लेकिन क्या भारतीयता जैसी कोई चीज़ है? और अगर है तो वह क्या है? श्रीअरविंद ने इस संदर्भ में कहा है - 

       “राष्ट्र केवल एक भौगोलिक या भौतिक इकाई नहीं है। वह शरीर, प्राण, मन, आत्मा और अद्वितीय स्वभाव तथा प्रतिभा वाली एक जीवित प्राणी है।”

          इस परिप्रेक्ष्य में भारतीय होने का अर्थ है सचेतन या अचेतन रूप से भारत की आत्मा और मस्तिष्क के प्रति ग्रहणशील होना और उसके अनुरूप होना। लेकिन व्यक्तिगत और राष्ट्रीय चरित्र, स्वभाव, गुणों और मूल्यों के संदर्भ में इसका क्या अर्थ है?

         सर्व प्रथम, एक भारतीय मानता है कि राष्ट्र मात्र एक भौगोलिक अवधारणा नहीं है। उसका मानना ​​है कि भारत एक जीवित दैवीय शक्ति, एक महान देवी और सार्वभौमिक माता का स्वरूप है। एक भारतीय के अनुसार देशभक्ति का अर्थ राष्ट्र की इस दिव्य आत्मा के प्रति सचेत होना और माँ के रूप में उसकी पूजा करना और उसकी सेवा करना है। एक भारतीय, राष्ट्र के भूगोल में माँ के भौतिक स्वरूप के दर्शन करता है; राष्ट्र के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवन में माँ की जीवन शक्ति को पाता है; और उसके मन और आत्मा में राष्ट्र की संस्कृति और धर्म, कला और साहित्य, विज्ञान और दर्शन, निवास करती है। एक भारतीय भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत में, भारत की आत्मा की अद्वितीय आध्यात्मिक प्रतिभा और उसकी नियति के दर्शन करता है।

       द्वितीय, भारतीय स्वयं को ईमानदारी से सत्य की निरंतर खोज के रूप में व्यक्त कर सकता है। लेकिन भारतीय मन कानून, प्रक्रिया और घटना के बाहरी सत्य से संतुष्ट नहीं है। इसका आग्रह चीजों की सबसे गहरी उत्पत्ति और सार के लिए है। उदाहरण के लिये, यदि वह एक वैज्ञानिक है तो वह पदार्थ के बाहरी रूप के नियमों और प्रक्रिया को जानने से संतुष्ट नहीं है; वह उस पदार्थ की आध्यात्मिक उत्पत्ति और उसके सार तत्व की भी खोज करता है। यदि वह धार्मिक स्वभाव का है तो उसकी सहज आस्था उसमें वास करने वाली दिव्यता में होती है। वह बाहरी स्वरूप के बजाय आंतरिक देवत्व की खोज करता है। लेकिन बाह्य रूप के उपासकों के प्रति उनके मन में कोई अभिजात्यवादी अवमानना ​​नहीं है। उनका मानना ​​है कि सर्वव्यापी परमात्मा किसी भी बाहरी रूप या प्रतीक में प्रकट हो सकता है।

          भारतीय के इस धार्मिक स्वभाव की तीसरी विशेषता है दैवीय वास्तविकता के प्रति उसका गैर-हठधर्मी और सार्वभौमिक दृष्टिकोण। भारतीय मानस की यह सर्वोच्च सहिष्णुता नास्तिकता को भी एक धर्म और ईश्वर प्राप्ति का मार्ग मानती है। भारत के तीन महानतम योगियों, बुद्ध, महावीर और पतंजलि ने गैर आस्तिक आध्यात्मिकता का प्रचार किया और माना कि आध्यात्मिक मुक्ति के लिए रचनात्मक ईश्वर या व्यक्तिगत ईश्वर में विश्वास आवश्यक नहीं है। इन तीनों को भारतीय धार्मिक मानस द्वारा महान आध्यात्मिक विभूतियों के रूप में स्वीकार और सम्मानित किया गया, क्योंकि भारतीय मानते हैं कि सत्य की ईमानदार और निस्वार्थ खोज, चाहे किसी भी क्षेत्र में हो, उतनी ही धार्मिक या आध्यात्मिक दृष्टिकोण है जितना कि ईश्वर के प्रति प्रबल आस्था और भक्ति।      

          भारतीय स्वभाव का चौथा महत्वपूर्ण गुण मानवीय और नैतिक मूल्य-प्रणाली है। भारतीय मानते हैं कि "कर्म करने वाले व्यक्ति से विचारक बड़ा है, और विचारक से आध्यात्मिक व्यक्ति बड़ा है"। भारतीय मनोविज्ञान में, आध्यात्मिकता बुद्धि से अधिक महान है और बुद्धि संवेदना और क्रिया की गतिशील क्षमताओं से अधिक महान है।

          भारतीय स्वभाव का पाँचवाँ महत्वपूर्ण गुण उसकी आंतरिकता है। वह स्वभाव से चिंतनशील और दार्शनिक है। वह न केवल ध्यान के दौरान बल्कि जाग्रत जीवन और क्रिया के दौरान भी अंदर जीने की इच्छा रखता है। भारतीय मन मानव जीवन की प्रत्येक गतिविधि, अर्थशास्त्र, राजनीति, शिक्षा, कला, वाणिज्य, व्यवसाय, विज्ञान, प्रौद्योगिकी में इस आंतरिक सत्य और नियम की खोज करता है। उदाहरण के लिए, नैतिकता में, भारतीय मन बाहरी कार्य की अच्छाई के बजाय मन, हृदय और आत्मा की आंतरिक अच्छाई, निःस्वार्थता और उदारता पर जोर देगा; कला में भारतीय सौंदर्यवादी स्वभाव बाहरी रूप के पीछे छिपे आंतरिक सत्य और सौंदर्य को देखने, महसूस करने और व्यक्त करने की आकांक्षा रखता है।

          यह भारत के मूल वैदिक मन की अभिन्न दृष्टि है, जिसने भारतीय संस्कृति और सभ्यता का निर्माण किया। वैदिक ऋषियों ने इसे मानवता के भविष्य के विकास के लिए लागू किया। इसे बाद में दर्शन को नकारने वाली विशिष्टतावादी दुनिया द्वारा कमजोर और विकृत कर दिया गया। सच्चा भारतीय मन इस मूल अभिन्न दृष्टि को पुनः प्राप्त करने का प्रयास करेगा

          एक मानव के ये विशेष गुण ही उसे भारतीय बनाते हैं और यही है भारतीयता।

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कैसे करें निर्णय?

 

जो कम जानता है वह मानता है कि वह बहुत जानता है, लेकिन जो बहुत जानता है वह मानता है कि वह बहुत कम जानता है। श्रीमदभगवतगीता ऐसा ही एक ज्ञान है, जिन्होंने इसे नहीं जाना, नहीं पढ़ा, नहीं सुना वे मानते हैं कि वे इसे जानते हैं। लेकिन जिन संतों ने, विद्वानों ने इसे जाना उन्होंने इसकी अलग-अलग व्याख्या की। उनमें मतभेद हैं लेकिन विरोध नहीं। वे उन सभी व्याख्याओं को स्वीकार करते हैं।

          शंकराचार्य अद्वैतवादी थे। उनका कहना था कि जगत् मिथ्या है, ब्रह्म ही सत् है, आत्मा भी मूलतः ब्रह्म है, उन्होंने ज्ञान योग पर बल दिया। रामानुजाचार्य विशिष्टाद्वैतवादी थे, उन्होंने भक्ति योग की चर्चा की। लोकमान्य तिलक ने कर्म योग कर ज़ोर दिया, श्री अरविंद ने इन तीनों योग के महत्व को स्वीकार करते हुए, तीनों का योग कर दिव्यकर्म या पूर्ण योग की चर्चा की। महात्मा गांधी ने माना कि गीता से हमें मार्ग-दर्शन प्राप्त होता है।

          एक साधारण पाठक-साधक भ्रमित हो जाता है – ज्ञान योग, भक्ति योग, कर्म योग, दिव्य कर्म, मार्ग-दर्शन... क्या करे, क्या न करे? कोई मोक्ष की बात करता है, कोई एकांत साधना की, कोई हिमालय की ऊचाइयों पर गुफाओं में बैठ कर तपस्या करने की। कोई कहता है मोक्ष ही अंतिम लक्ष्य है तो कोई बताता है कि यह अंत नहीं है यह तो प्रारम्भ है। हमें मोक्ष प्राप्त करना है, इसका अर्थ यह नहीं है कि हमें कहीं जाना है बल्कि हमें मोक्ष अपने अंदर उतारना है, अपने दैनिक जीवन में इसे उतारना है, यह दिखना चाहिये, इसका अहसास होना चाहिये। प्रश्न है कि हम, तुम, वह, सब इसे अपने जीवन में कैसे उतारें? सही बात तो यह है कि यहाँ कोई हम, तुम, वह, सब हैं ही नहीं जो है वह बस है। यानी हमें कुछ करना नहीं है हमें बस सिर्फ होना है। 

          पूरी गीता में श्रीकृष्ण मैं और मेरा की भाषा में बात करते हैं तो लगता है कि यह तो बड़ा अहंकारी है। लेकिन फिर बात समझ आती है अहम ब्रह्मास्मि’, हम उसी एक ब्रह्म के ही अंश है। हमने जीवन को अपनी सोच, अपने विश्वास, अपने घमंड, अपनी धारणा, अपने पूर्वाग्रह  के अनुसार गढ़ लिया है। गिलास आधा भरा है या आधा खाली का उदाहरण हम जानते हैं। इसका उत्तर हमारा अपना है, वही हमारी दुनिया है। यह वह दुनिया नहीं है जो बाहर है। यह दुनिया हमारी अपनी तामसिक, राजसिक और सात्विक गुणों की दुनिया है जिसका निर्माण हमने खुद कर लिया है।

          अर्जुन बड़े सीधे और सपाट प्रश्न करता है लेकिन उसके उत्तर श्रीकृष्ण बड़े कूटनीतिज्ञ की तरह देते हैं। आप कभी कर्म की बात करते हैं कभी ज्ञान की’, कभी कर्मों से सन्यास की तो कभी कर्मयोग की’, कभी द्वैत की कभी अद्वैत की’, कभी सगुण तो कभी निर्गुण उपासकों की’, सन्यास और त्याग में क्या फर्क है। श्रीकृष्ण इन सब के उत्तर देते हैं, विस्तृत उत्तर देते हैं। समझने के लिये चिंतन-मनन करना पड़ता है।

          यह ठीक वही परिस्थिति है। चार अंधे हाथी देखने निकले – किसी के हाथ हाथी का पैर आया किसी के हाथ आया सूंड, तो किसी के पोंछ, किसी के कान, किसी के पेट। जिसको जैसे हाथ लगा उसने वैसा ही समझा। एक ने उस सब को जोड़ कर व्याख्या कर दी। लेकिन तब भी, हाथी इससे कहीं ज्यादा था। कोई गलत नहीं था लेकिन कोई पूर्ण सत्य भी नहीं।

          तब, क्या करें। न इसकी चिंता करें न फिकर, लेकिन यह स्वीकार करें कि अभी बहुत थोड़ा जाना है और अभी बहुत जानना बाकी है। लेकिन वहाँ रुकें नहीं आगे बढ़ते रहें। जितना जानते हैं उसके सहारे ही आगे बढ़ते चलें।  जैसे-जैसे आगे बढ़ेंगे द्वार खुलते जाएंगे प्रकाश उज्ज्वल से उज्ज्वलतर होता जायेगा, बादल छाँट जाएंगे। लेकिन जैसे-जैसे जानते जायें उसे जीना शुरू करें, जब जीने लगें तब होना शुरू करें।

जानना अच्छा है, जीना बेहतर है लेकिन होना सर्वोत्तम है।

          ज्ञान केवल जमा करते रहें तो उसका कोई अर्थ नहीं है, आवश्यक है उस ज्ञान को कार्य रूप में परिणीत करना, उस पर आचरण करना, उसे अपने जीवन में उतरना। सब होने के बाद अगर वैसा हो नहीं सके तो सब बेकार है। लेकिन यह होना ही सबसे कठिन है। इसमें सबसे बड़ी बाधा है हम स्वयं, हमारा अभिमान, हमारा ईगो। जाने-अनजाने यह हमें रोकता है। हमें कुछ पसंद है और कुछ नहीं। जो पसंद है उसे सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं जो नापसंद है उसे खारिज कर देते हैं। और यह पसंद-नापसंद हमारी अपनी  निर्मित धारणाओं पर होता है। केवल ज्ञान जमा करना, भजन करना, मंदिर जाना, तीर्थों में जाना, प्रवचन सुनना पर्याप्त नहीं है। अगर हमने उसे जीवन में नहीं उतारा, तो हम वैसे हो नहीं  सके। कथनी होकर रह गई, करनी में परिणत नहीं हो सकी। हमें प्रतिस्पर्द्धा के बजाय सहयोग का रास्ता चुनना होगा।  हमने अपने साँचे (मौल्ड्स) बना रखें हैं, काट-छांट कर, तोड़-मरोड़ कर सब उसी में ढालते हैं। और अगर नहीं ढलते हैं तो उन्हें अस्वीकार कर देते हैं। अगर कोई सिद्धान्त का पक्का होता है तो वह सपने देखने वालों को, अलग-अलग प्रयोग करने वालों को स्वीकार नहीं कर पाता। वह जो छोटी-छोटी बातों को भी महत्व देता है वह सिद्धांतवादी को स्वीकार नहीं कर पाता और उनकी परवाह नहीं करता। चाहे उनमें और दूसरे सद्गुण हों उसका तिरस्कार कर देता है। यही है मानव का स्वभाव। उससे बाहर निकलना होगा। जो जैसा है उसे ही स्वीकार करना सीखना होगा।  

          दिक्कत यही है कि हमें पता ही नहीं चलता है कि हमारा निर्णय किस पर आधारित है। हमारा अभिमान इतने सूक्ष्म तरीके से हमारे निर्णयों को प्रभावित करता है कि न तो हम समझ पाते हैं न ही सहमत कि यह निर्णय किसी अभिमान पर, किसी पूर्वाग्रह पर आधारित है। अपने विचारों को, निर्णयों को अपने अभिमान की दृष्टि से न देख कर दैवीय दृष्टि दे देखें। अपनी अभिमान से बने फिल्टर्स  (छलनियों) से न छान कर इन दैवीय फिल्टर्स से छानें - हमारा निर्णय सच्चाई और निष्कपटता से आ रहा है या इसमें झूठ और कपटता है, विनम्रता है या कठोरता है, कृतज्ञता है या कृपणता है, साहस है या डर है, प्रगति है या अवनति है, ग्रहणशीलता है या तिरस्कार है, अभिप्सा है या अनिच्छा है, अच्छाई है या बुराई है, उदारता है या कृपणता है, शांति है या कलह है, समानता है या असमानता है, मेहनत है या आलस्य है, यह हमारे लिए अच्छा है या फायदेमंद है। यह बड़ा कठिन प्रतीत होता है लेकिन एक बार इस पर काम करने लगें तो शीघ्र ही महसूस करेंगे कि यह बड़ा आसान है और निरंतर अभ्यास से स्वतः होने लगेगा। हाँ कहीं से प्रारम्भ तो करना ही होगा। एक बार इन फिल्टर्स का प्रयोग करने लगेंगे तो दिखने लगेगा कि हम अपने निर्णयों में किसकी मिलावट कर रहें हैं, यह कहाँ से आ रहा है। इसमें क्या है, क्या रखना है क्या छोड़ना है। यह हमारे जीवन में, आचार-विचारों में, रहन-सहन में, रंग-ढंग में, चाल-ढाल में, लहजे में साफ-साफ परिलक्षित होने लगेगा। यही है वह संपत्ति जिसे हमने अपने पुरखों से, सभ्यता और संस्कृत से मिली है और इसे ही आगे आने वाली पीढ़ी को देनी है।

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https://youtu.be/TxhCv5O5G4k

सोमवार, 1 जुलाई 2024

सूतांजली जुलाई 2024


 जहां भी ईमानदारी और सद्भावना होती है,

                                                दैवीय शक्ति की सहायता मौजूद रहती है।

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मातृ-भाषा                                                                सुधा-मूर्ति

(“हमारा परिचय न हमारी भाषा है, न हमारा धन। हमारा परिचय है हमारी सोच, हमारी शालीनता। महत्व अपनी भाषा का है, न कि विदेशी भाषा का। यह हमारे देश का दुर्भाग्य है कि 1947 के बाद भी सरकार ने ऐसी नीतियाँ अपनाई कि युवा-वर्ग यही समझता-मानता है कि जीवन में तरक्की करने के लिए अँग्रेजी का ज्ञान आवश्यक है। 47 के बाद भी स्थानीय भाषा के बदले विदेशी भाषा का ही ज़ोर रहा, सरकार ने भी उसे ही तरजीह दी, अँग्रेजी फलती-फूलती रही हमारी भाषा मिटती रही और हम खड़े-खड़े देखते रहे।” – सुधा मूर्ति)  

          पिछले साल मैं लंदन के हीथ्रो इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर अपनी फ्लाइट में चढ़ने का इंतजार कर रही थी। मैं एक बुजुर्ग महिला सी दिखती आम भारतीय परिधान में टर्मिनल के गेट पर खड़ी थी। यह फ्लाइट बैंगलोर जा रही थी इसलिए आसपास बहुत से लोग कन्नड़ में बात कर रहे थे।

          कुछ मिनटों के बाद बोर्डिंग की घोषणा हुई और मैं अपनी लाइन में खड़ी हो गई। मेरे सामने एक अत्याधुनिक महिला सिल्क के इंडो-वेस्टर्न पोशाक पहने खड़ी थी, हाथ में मंहगा बैग था और पैरों में ऊंची हील की चप्पल। उसके साथ उसकी एक मित्र भी खड़ी थी जिसने सिल्क की महंगी साड़ी पहनी थी, मोतियों का हार, उससे मिलते कान के झुमके और हाथों में हीरे जड़े कंगन थे। अचानक ही मेरे सामने वाली महिला ने कुछ किनारे होकर मुझे इस तरह से देखा जैसे उसे मुझपर तरस आ रहा हो। अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए उसने मुझसे पूछा, ‘क्या मैं आपका बोर्डिंग पास देख सकती हूं?’ मैं अपना बोर्डिंग पास दिखाने ही वाली थी लेकिन तभी मैंने पूछा लिया, ‘क्यों?’

          ‘वेलयह लाइन सिर्फ बिजनेस क्लास यात्रियों के लिए है,’ उसने बहुत रौब से कहा और उंगली के इशारे से मुझे इकोनॉमी क्लास की लाइन में खड़े होने के लिये कहा।

          मैं उसे बताने वाली ही थी कि मेरे पास भी बिजनेस क्लास का टिकट है लेकिन कुछ सोचकर मैं रुक गई। मैंने उससे पूछा, ‘क्यों, क्या आपको मेरे भारतीय परिधान और भाषा के कारण ऐसा लग रहा है कि मुझे इस लाइन में नहीं लगना चाहिये?’

          मेरे प्रश्न का उत्तर देने के बजाय उसने गहरी साँस भरते हुए कहा, ‘वेल, देखिये ईकोनॉमी क्लास और बिजनेस क्लास की टिकटों की कीमत में बहुत अंतर होता है। बिजनेस क्लास की टिकटें लगभग दो-तीन गुना महंगी होती हैं…, बिजनेस क्लास की टिकट के यात्रियों को कुछ खास सहूलियतें मिलती हैं।

          ‘अच्छा?’ मैंने पूछा, आप कैसी सहूलियतों की बात कर रही हैं?’

          उन्हें कुछ चिढ़ सी होने लगी। लेकिन उन्होंने बिज़नेस क्लास की सहूलियतों का संक्षेप में ब्योरा दिया और अंत में जोड़ा, अब आपको ईकोनॉमी क्लास और बिजनेस क्लास का अंतर पता चल गया है तो आप वहाँ जाकर अपनी लाइन में लगिये।उसने मुझे सुझाव दिया। लेकिन मैं वहाँ से हिलने को तैयार नहीं थी। वह महिला अपनी मित्र की ओर मुड़ी, ‘इन कैटल-क्लास (cattle class, मवेशी-वर्ग) के साथ बात करना ही बेकार है।

          मैं नाराज़ नहीं थी। कैटल-क्लास शब्द से जुड़ी अतीत की एक घटना मुझे याद आ गई। एक दिन मैं बैंगलोर में एक हाइ-सोसायटीडिनर पार्टी में अपने भारतीय परिधान में गई थी। बहुत से स्थानीय गणमान्य और सामाजिक लोग वहां मौजूद थे। मैं किसी मेहमान से कन्नड़ में बातें कर रही थी तभी एक आदमी हमारे पास आया और बहुत धीरे-धीरे अंग्रेजी में बोला, ‘May I introduce myself ? I am… ’ उसे यह लग रहा था कि मुझे धाराप्रवाह अंग्रेजी समझने में दिक्कत होगी।

मैंने मुस्कुराते हुए अंग्रेजी में कहा, ‘आप मुझसे अंग्रेजी में बात कर सकते हैं।

ओह,’ उसने थोड़ी हैरत से कहा, ‘माफ़ कीजिए। मुझे लगा कि आपको अंग्रेजी में बात करने में असुविधा होगी क्योंकि मैंने आपको कन्नड़ में बातें करते सुना।

अपनी मातृ भाषा में बात करने में शर्म कैसी? यह तो मेरा विशेषाधिकार है। अपनी मातृ भाषा का उपयोग करना शर्मिंदगी का सबब नहीं है। मैं अंग्रेजी में तभी बात करती हूं जब किसी को मेरी भाषा नहीं आती’, मैंने कहा।  

          खैर, इधर एयरपोर्ट पर मेरी लाइन आगे बढ़ने लगी। जब मेरा बोर्डिंग पास दिखाने का वक्त आया तो मैंने देखा कि वे दोनों महिलाएँ पीछे मुड़ कर यह देख रही थीं कि मेरे साथ क्या होगा? अटेंडेंट ने मेरा बोर्डिंग पास लिया और प्रफुल्लित होते हुए कहा, ‘आपका स्वागत है, मैडम! हम पिछले हफ्ते भी मिले थे न?’

जी हाँ,’ मैंने कहा। अटेंडेंट ने मुस्कुराकर हाथ जोड़े।

          उन दोनों महिलाओं के करीब से गुजरते हुए मैंने पूछ लिया, कृपया मुझे बताइएआपको यह क्यों लगा कि मेरे पास बिजनेस क्लास का टिकट नहीं हो सकता? क्या इसलिए कि मैं आम भारतीय वेश-भूषा में थी और अँग्रेजी में बात न कर अपनी मातृ-भाषा में बात कर रही थी?’ वे दोनों स्तब्ध होकर मुझे देखती रहीं, उनकी जुबान से कोई शब्द नहीं निकला।

          ‘आपने मुझे कैटल-क्लास का व्यक्ति कहा, लेकिन क्लास इससे नहीं बनती कि आपके पास कितनी संपत्ति है।  इस दुनिया में पैसा बहुत से गलत तरीकों से कमाया जा सकता है। आपका पैसा आपको यह हक नहीं देता कि आप दूसरों की हैसियत का निर्णय करती फिरें। मदर टेरेसा बहुत क्लासी महिला थीं। भारतीय मूल की गणितज्ञ मंजुल भार्गव भी बहुत क्लासी महिला हैं। यह विचार बहुत ही बेबुनियाद है कि बहुत सा पैसा आपको किसी क्लास तक पहुँचा सकता है। बहुत सारे धन का होना आपकी क्लास का परिचायक नहीं है मैं उनके उत्तर का इंतज़ार किये बिना आगे बढ़ गई।

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भक्ति में भी अ-कर्ता भाव?  

          चौरासी लाख योनियों में केवल मानव योनि ही कर्म योनि है, बाकी सब भोग योनियां हैं। मानव जीवन में आकर अच्छे कर्म करते रहें, किसी का बुरा न करें, यही मानव जीवन का उद्देश्य है। "जैसा होगा कर्म वैसा होगा फल, यही है गीता का ज्ञान। कर्म करते रहो, फल के प्रति आसक्ति न रखो।" यानी हर कर्म के साथ उस कर्म का फल निश्चित है। जिस प्रकार हजारों गायों में बछड़ा अपनी मां को ढूंढ़ लेता है, उसी प्रकार कर्मफल, कर्ता को ढूंढ़ लेता है। लेकिन यदि बिना कर्म के जीव एक क्षण नहीं रह सकता और कर्म का फल भोगने के लिए बार-बार जन्म लेना पड़ता है तो फिर कर्म बंधन से मुक्ति कैसे हो? क्या शुभ कर्म करना ही काफी है? शुभ कर्म करने पर भी क्या जीव बंधन में है? समझने का प्रयत्न करते हैं।

          जिस प्रकार परमात्मा अटल है, इसी प्रकार इसकी रचना और विधान भी अटल, अद्भुत और विलक्षण है। इसी विधान के अंतर्गत जीव को कर्म करने की स्वतंत्रता भी है और कर्म फल भोगने का सिद्धांत भी है। बंधन का कारण कर्म नहीं बल्कि कर्मों में आसक्ति और हमारा कर्तापन है। हर गुरु, पीर, पैगम्बर ने मनुष्य को कर्म करने का उपदेश दिया है। श्रीमद्भगवद्गीता में लिखा है - आसक्ति को त्याग कर योग में स्थित होकर कर्म करो। ईशावास्योपनिषद के पहले ही मंत्र में- 'तेन त्यक्तेन भुंजीथा कहकर ऋषि त्याग भाव से भोग करने का उपदेश दे रहे हैं। त्याग भी हो और भोग भी यह कैसे संभव है? युद्ध क्षेत्र में गये सैनिक का उदाहरण देकर संत समझाते हैं कि लड़ाई के दौरान एक वीर सैनिक द्वारा दुश्मन के सैकड़ों सैनिकों को मार डालने पर उसे वीरता का पुरस्कार मिलता है। लेकिन वही सैनिक घर आकर किसी निजी रंजिश के चलते पड़ोसी को मार डाले तो उसे उम्रकैद या फांसी हो सकती है। तो क्या जीव भी सैनिक की भांति किसी परम शक्ति के अधीन होकर कर्म करे? क्या इससे  कर्तापन समाप्त हो सकता है? जब जीव कर्ता ही नहीं रहेगा, तो कर्म का फल कैसा और फल का भोग किसको? आखिर कौन है कर्ता? क्या केवल ईश्वर ही समस्त जगत का कारण भी है और कर्ता भी और सब कर्म इसी के निमित्त करने हैं? बड़ी उलझन है।

          एक और उदाहरण देखें। अगर कोई हमें पांच लाख रुपये किसी व्यक्ति विशेष को देने के लिये दे, तब जब तक हम उस व्यक्ति को उसकी अमानत सौंप नहीं देते, तब तक हम उस बोझ से मुक्त नहीं हो सकते। अगर हम उसके मालिक तक नहीं पहुंचते और पहले ही पकड़ लिये जाते हैं  तब हम चाहे लाख दलीलें दें और कहें कि ये पैसे मेरे नहीं हैं, हमें ही उसका मालिक माना जायेगा। अर्थात, जब तक कर्ता का पता नहीं चलता जीव चाहे लाख रटन लगा ले, समर्पण नहीं हो सकता। अच्छे कर्म सोने की जंजीर है और बुरे कर्म लोहे की। लेकिन दोनों ही जंजीर है, दोनों ही बंधन का कारण है। लोहे की हथकड़ी तो फिर भी छूट जाती है लेकिन सोने की हथकड़ी, शुभ कर्मों का यह सूक्ष्म अहंकार, तो छूटता ही नहीं। समर्पण के लिए कर्ता का ज्ञान, बोध, जानकारी और समझ होना जरूरी है ताकि तेरा तुझको अर्पण, क्या लागे है मेरा कहा जा सके।

          ज्ञान प्राप्ति के बाद जीव के कर्म ईश्वर के निमित्त हो जाते हैं। जिस प्रकार बैंक का कैशियर दिन में लाखों रुपए जमा होने पर न खुश होता है, न ही करोड़ों निकाले जाने पर दुखी होता है और न ही उसे कर्तापन का जरा सा भी अहसास होता है, उसी प्रकार ज्ञानी, कर्मों से निर्लिप्त और अनासक्त हो जाता है। भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं, हे अर्जुन! जिस प्रकार एक छोटी सी चिंगारी लाखों मन लकड़ियों के ढेर को जलाकर नष्ट कर देती है, उसी प्रकार ज्ञान रूपी अग्नि जन्मों-जन्मों के संचित कर्मों को पल भर में नष्ट कर देती है। ज्ञानी परम शक्ति के अधीन होकर निष्काम और अकर्ता भाव से कर्म करता है। जिस प्रकार उबले हुए बीज दोबारा नहीं उगते उसी प्रकार उसके कर्म, फल रहित हो जाते हैं और जीव फल भोगने के लिए बार-बार जन्म-मरण के बंधन में नहीं आता।

          इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि उसमें अकर्मण्यता आ जाती है बल्कि वह पहले से भी अधिक शक्ति से ईश्वर द्वारा प्रदत्त तन-मन-धन के सभी  सामर्थ्य से एक कर्म-योगी बन संसार में विचरता है और अपने सभी कर्तव्यों को निभाता है। कर्ता न होने से ऐसा भी नहीं कि जीव अपनी मर्जी से अच्छा-बुरा कुछ भी कर्म कर ले क्योंकि अब उसे कर्म का फल तो भोगना ही नहीं, बल्कि जीव ईश्वरीय इच्छा में आ जाता है। ईश्वरीय इच्छा सकारात्मक है, सृजन है, सेवा है, संसार का भला है।

श्रीमदभगवद गीता का गूढ उपदेश भी यही है मानव सत्गुरु की शरण में  आकर तथा कर्ता ईश्वर को जानकर इसके निमित्त होकर सभी कर्म करे। तभी जीव कर्ता से अकर्ता हो सकता है और सभी कर्म बंधनों से मुक्त हो सकता है। इस विशेष उद्देश्य के कारण ही मानव जीवन की विशेषता है।

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नजरिया

          एक दिन एक अमीर व्यक्ति अपने बेटे को किसी गाँव में ले गया। वह अपने बेटे को यह दिखाना चाहता था कि वे कितने अमीर और भाग्यशाली हैं, जबकि गाँव के लोग कितने गरीब हैं।

          उन्होंने कुछ दिन एक गरीब के खेत पर बिताये और फिर अपने घर वापस लौट आये। रास्ते में अमीर व्यक्ति ने बेटे से कहा - 'तुमने देखा, लोग कितने गरीब हैं और वे कैसा जीवन जीते हैं?' बेटा ने कहा - 'हाँ, मैंने देखा। हमारे पास एक कुत्ता है और उनके पास चार हैं। हमारे पास एक छोटा-सा स्वीमिंग पूल है और उनके पास एक पूरी नदी है। हमारे पास रात को जलाने के लिये विदेशों से मँगायी गयी रोशनी है और उनके पास रात को चमकनेवाले अरबों तारे हैं। हम अपना खाना बाजार से खरीदते हैं और वे अपना खाना खुद अपने खेत में उगाते हैं। हमारा छोटा-सा परिवार है, जिसमें पाँच लोग हैं, जबकि उनका पूरा गाँव उनका परिवार है। हमारे पास खुली हवा में घूमने के लिये एक छोटा-सा बगीचा है और उनके पास बड़े-बड़े खेत हैं जो कभी समाप्त ही नहीं होते। हमारी रक्षा करने के लिये हमारे घर के चारों तरफ बड़ी-बड़ी दीवारें हैं और उनकी रक्षा करनेके लिये उनके पास अच्छे-अच्छे दोस्त हैं।'



          अपने बेटे की बात सुन, अमीर व्यक्ति कुछ बोल नहीं सका बेटे ने अपनी बात समाप्त करते हुए कहा- 'धन्यवाद पिताजी, मुझे यह बताने के लिये कि हम कितने गरीब हैं।’

दुनिया को अपनी नजरों से देखें, दूसरे की नजरों से नहीं।

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यू ट्यूब पर सुनें :

 https://youtu.be/0MX6tfOsiOI


शनिवार, 1 जून 2024

सूतांजली जून 2024

 


अपने भीतर की चेतना और संवेदनशीलता को जाग्रत रखें। जिससे,

हर घटना को गहराई से महसूस कर सकें,

गलत को गलत और अंधेरे को अंधेरा कह सकें ।

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मौलिक प्रश्न

          बड़ा विचित्र प्राणी है मानव। जहां उसे अपने जीवन का कुछ समय ही गुजारना है वहाँ के बारे में उसे पूरी जानकारी चाहिये, लेकिन जहां उसे ता-उम्र व्यतीत करना है उसके लिए उस में  कोई जिज्ञासा नहीं।

          “अच्छा! क्या तुम्हारे मन में भी क्या कभी यह प्रश्न उठता है कि इस दुनिया का निर्माण किसने किया? क्यों किया? यह दुनिया है क्या?  क्या उद्देश्य है उसका? हमें क्यों भेजा है यहाँ? दुनिया के मालिक तो ईश्वर हैं। हम उन्हें कितना जानते हैं? क्या उन्हें जानना आवश्यक है?,” शून्य की तरफ देखते हुए विनोद ने प्रश्न किया।

          प्रशांत अपनी चिर-परिचित मुद्रा में गर्दन झुकाये, एकाग्र चित्त से विनोद के प्रश्न सुन रहे हैं। उन्हें पता है ये प्रश्न पूछे नहीं गये हैं, सिर्फ बताये गये हैं। कुछ वर्षों के परिचय में ही प्रशांत और विनोद में आपस में ऐसी समझ आ गई है। हाँ, अभी सिर्फ सुनना है, ये उत्तर की अपेक्षा वाले प्रश्न नहीं हैं।  दोनों दोपहर का भोजन और शाम की चाय प्रायः साथ-साथ लेते हैं और अध्यात्म, मनोविज्ञान और संसार भर की हंसी-विनोद की बातें भी करते रहते हैं, खुल कर हँसते हैं। कभी-कभी उनके लिये अपनी हंसी पर लगाम लगाना भी दुष्कर हो जाता है। उन्हें प्रातः हास्य योगाभ्यास (लाफटर योग) की अलग से जरूरत नहीं है। अनेक बातों पर उनमें सहमति है तो ऐसी भी अनेक विचार हैं जहां उनके मध्य 36 का आंकड़ा है। लेकिन वे कभी विरोधी बातों पर चर्चा नहीं करते। व्यर्थ के विवाद में नहीं पड़ते।

          प्रशांत विनोद द्वारा सूत्रपात किये गए इस गंभीर चर्चा का सूत्र खोज रहे हैं। समझने में समय नहीं लगा। अभी-अभी शारदा वहीं उनके साथ बैठी थी और बता रही थी कि उसने किसी अन्य बड़ी कंपनी में जाने का मन बना लिया है। प्रशांत, शारदा के साथ विनोद कर रहे थे और विनोद, शारदा  की बातें प्रशांत मन से सुन रहे थे। शारदा बता रही थी कि उसने पता लगाया है कि वह किस की कंपनी है, क्या करती है, उसका बॉस कौन होगा – वगैरह-वगैरह। बहुत उत्तेजित है और चहक-चहक कर बता रही थी।

          तभी विनोद ने हस्तक्षेप करते हुए कुछ प्रश्न पूछ लिये, मसलन क्या उसने यह भी पता लगाया है कि इस नयी कंपनी में उसका कर्तव्य-उत्तरदायित्व क्या होगा? कंपनी को उसे से क्या अपेक्षा है? कंपनी उसे क्यों रख रही है?.... ऐसे प्रश्नों से रानी उचट गई और हाथ हिला कर उठ गई। प्रशांत ने मुसकुराते हुए कहा, “बेचारी को भगा दिया!”

          प्रशांत की टिप्पणी को नजर अंदाज करते हुए विनोद अपनी ही रौ में कहते गए, “जो मूलभूत प्रश्न हैं उनके उत्तर न हम जानते हैं और न ही जानना चाहते हैं। ये मौलिक प्रश्न हमें अ-सहज कर देते हैं।  लेकिन ये ही वे प्रश्न हैं जो हमारे जीवन को प्रभावित करती हैं और दुनिया को एक बेहतर दुनिया बना सकती है।”

          “हाँ विनोद, लेकिन ऐसा नहीं है कि लोग इससे बेखबर हैं। ऐसे अनेक लोग हैं जिन्होंने इस पर विचार किया है। सबों को एक जैसा उत्तर नहीं मिला, मिल भी नहीं सकता। सबों को सब प्रश्नों के उत्तर भी नहीं मिले। जो जितने गहरे गया उसे वैसे ही और उतने ही उत्तर भी मिले। किसी ने अपना जीवन सुधारा किसी ने दुनिया को भी सुधारा,” प्रशांत ने जोड़ा।

          “ये प्रश्न उतने कठिन भी नहीं हैं जैसा पहली नजर में प्रतीत होते हैं – इस दुनिया का मालिक कौन है? उसकी हमसे क्या अपेक्षा है? वह हमसे क्या चाहता है? हमारा क्या उत्तरदायित्व है? हमारा क्या कर्तव्य है? हमारा क्या अधिकार है? हमारी क्या सीमाएं हैं? और फिर हम अपने उत्तरदायित्व का कितना और कैसा निर्वाह कर रहे हैं?’ जैसे-जैसे इस पर विचार करते हैं हमें हमारे सामर्थ्य के  अनुरूप उत्तर भी मिलने लगते हैं  और पथ प्रदर्शक भी। श्रीअरविंद का पथ प्रदर्शन श्रीकृष्ण ने ही किया था,” विनोद ने कहा।

          “और ये वे मौलिक प्रश्न हैं जिनके उत्तर मिलने लगते हैं तो दूसरे प्रश्न खुद-ब-खुद विलीन होने लगते हैं। हमें इन पर विचार करना चाहिये”, प्रशांत ने आगे कहा, हमें पहला कदम बढ़ाना होता है और अगर आगे मार्ग न सूझे तो आगे का मार्ग दिखाने कोई-न-कोई आ ही जाता है।

          जो भी आया है, वह जायेगा। साथ कुछ नहीं लाया था, साथ कुछ लेकर नहीं जायेगा। या तो दे कर जाये या छोड़कर जाये। बस यही दो विकल्प हैं हमारे पास। और यह स्पष्ट है कि कुदरत यही चाहता है कि हम छोड़ कर नहीं, दे कर जायें। कुदरत को जो भी देना होता है वह खुद नहीं देता किसी और से दिलवाता है। क्यों? संसार देकर जाने वाले को ही याद करता है छोड़कर जाने वाले को नहीं। कुदरत अपना नाम नहीं चाहता है, वह चाहता है कि आपका नाम हो, अतः छोड़ कर न जायें, दे कर जायें।

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उत्कृष्टता का मोल

          एक बढ़ई किसी गाँव में लकड़ियों की अद्भुत कलात्मक सामग्री और कलाकृतियाँ बनाया करता था। जब भी वह कुछ बनाता उसके मन में एक ही बात होती वह ईश्वर के लिए बना रहा है और कार्य की समाप्ति के बाद वह मानसिक रूप से अपनी कलाकृति को उन्हें ही भेंट कर देता था। उसकी हर सामग्री उत्कृष्टता का नमूना थी। धीरे-धीरे उसकी ख्याति चारों तरफ फैल गई और अब वह कलाकृतियों के साथ-साथ छोटे-मोटे भवन बनाने लगा। आस-पास के शहरों से सेठ आने लगे और अब वह महल भी बनाने लगा। अब वह बढ़ई न रहकर कलाकार बन चुका था। वहाँ का राजा भी उसका हुनर देखने पहुँचा। उसके कार्य को देख कर वह चमत्कृत रह गया। उसने उसे राजधानी में बुला लिया और वहाँ उसने एक-से-बढ़कर-एक भवनों का निर्माण किया।

          समय के साथ वह वृद्ध हो चला, थकने लगा था। एक दिन उसने राजा से कहा कि उसने अनेक निर्माण किए हैं, लेकिन अब उसका शरीर, आँखें, हाथ पहले की तरह सक्षम नहीं रहे अतः अब वह अपने गाँव जा कर बची-खुची जिंदगी वहीं अपने परिवार के साथ बिताना चाहता है। अतः उसे सेवा निवृत्त कर दिया जाये। राजा ने कहा कि जाने के पहले वह उनके लिए एक अंतिम भवन का निर्माण कर दे। राजा के कहने पर वह अंतिम भवन के  निर्माण कार्य में जुट गया। लेकिन इस बार उसकी इच्छा नहीं हो रही थी, बे-मन से बना रहा था। कई जगहों पर उसने कार्य की उत्कृष्टता से समझौता किया, प्रयोग में ली गई लकड़ियों एवं अन्य वस्तुओं से भी समझौता किया।

          खैर, निर्माण कार्य पूरा हुआ और वह राजा को सूचित करने दरबार में पहुंचा। राजा ने प्रसन्नता से कहा, “तुमने हमारे राज्य के लिये अनेक भवनों का निर्माण किया है लेकिन अपने खुद के लिए कभी कोई भवन नहीं बनाया। यह भवन राज्य की तरफ से तुम्हें पुरस्कार में दिया जाता है। अपने समस्त परिवार को यहीं बुला लो और सब साथ में यहीं रहो। अपने जीवन के इस अंतिम निर्माण पर अब वह पछता रहा था। औरों के लिए उसने एक-से-एक उत्कृष्ट निर्माण किये लेकिन अपने खुद के निर्माण में वह चूक गया था। 

          अपने हर कार्य को ईश्वरार्पण करें, उत्कृष्टता में कभी कमी न करें।

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ईश्वरीय अनुकम्पा                                         कहानी जो सिखाती है जीना

          सुकरात समुद्र तट पर टहल रहे थे। उनकी नजर तट पर खड़े एक रोते बच्चे पर पड़ी, प्यार से बच्चे के सिर पर हाथ फेरकर पूछा तुम क्यों रो रहे हो ? लड़के ने बताया मेरे हाथ में जो प्याला है मैं उसमें इस समुद्र को भरना चाहता हूँ पर यह मेरे प्याले में समाता ही नहीं।

          बच्चे की बात सुनकर सुकरात विस्माद में चले गये और स्वयं रोने लगे, अब पूछने की बारी बच्चे की थी, आप भी मेरी तरह रोने लगे पर आपका प्याला कहाँ है?’

          सुकरात ने जवाब दिया, बच्चे, तुम इस प्याले में समुद्र भरना चाहते हो, मैं अपनी बुद्धि में सारे संसार की जानकारी भरना चाहता हूँ। आज तुमने सिखा दिया कि मैं व्यर्थ ही बेचैन रहा। यह सुन बच्चे ने प्याले को दूर समुद्र में फेंक दिया और बोला, सागर, अगर तू मेरे प्याले में नहीं समा सकता तो, मेरा प्याला तो तुम्हारे में समा सकता है

          इतना सुनना था कि सुकरात बच्चे के पैरों में गिर पड़े और बोले बहुत कीमती सूत्र हाथ लगा है। हे  परमात्मा! आप तो मुझ में नहीं समा सकते पर मैं तो आपमें लीन हो सकता हूँ।

          ईश्वर की खोज में भटकते सुकरात को ज्ञान देना था तो भगवान उस बालक में समा गए। सुकरात का सारा अभिमान ध्वस्त कराया, जिस सुकरात से मिलने के लिए सम्राट समय मांगते थे वह सुकरात एक बच्चे के चरणों में लेट गए। ईश्वर जब आपको अपनी अनुकम्पा में लेते हैं तब आपके अंदर का मैं सबसे पहले मिटता है। शायद मैंने उल्टी बात कह दी। जब आपके अंदर का मैं मिटता है तभी ईश्वर की अनुकम्पा होती है

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