गुरुवार, 1 अक्टूबर 2026

सूतांजली अक्तूबर (प्रथम) 2026 निष्ठा : हमारी जिम्मेदारी

 


... कहने के लिए कोई अच्छी चीज़ न हो,

तो चुप रहो। ...यह मौन

भगवान् के काम के प्रति

वफ़ादारी है।

— श्री माँ (पॉण्डिचेरी)

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निष्ठा : हमारी जिम्मेदारी

जिस संस्था से हम जुड़े हैं, उसके प्रति हमारी निष्ठा की परीक्षा तब नहीं होती, जब सब हमारी इच्छा के अनुसार चल रहा हो। वास्तविक परीक्षा तब होती है, जब हमें किसी व्यवस्था से असहमति हो, किसी सहकर्मी से मतभेद हो या किसी का व्यवहार मनोनुकूल न हो। उस समय हम कौन-सा मार्ग चुनते हैं—निन्दा और शिकायत का या विवेक, संयम और सुधार का? हमारा यही चुनाव हमारी निष्ठा का प्रमाण होता है।

माँ का यह संदेश आश्रम के संदर्भ में आश्रमवासियों के लिए था, लेकिन इसका अर्थ हर उस संस्था, परिवार या समूह पर लागू होता है, जहाँ लोग किसी साझा उद्देश्य के लिए साथ कार्य करते हैं। मतभेद और कमियाँ होना स्वाभाविक है; प्रश्न यह है कि हम उन कमियों और उनसे जुड़े लोगों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं।

वाणी का प्रयोग पूरे विवेक के साथ करना चाहिए। वाणी केवल हमारे विचारों को ही नहीं, हमारे हृदय को भी प्रकट करती है। संबंधों को बनाने या बिगाड़ने के लिए कभी-कभी एक शब्द ही पर्याप्त होता है। एक ही विचार सहयोग की भावना जगा सकता है और वही विचार कटु भाषा में व्यक्त होकर अविश्वास और विभाजन का कारण बन सकता है।

यदि किसी सदस्य में कोई कमी दिखाई दे या किसी व्यवस्था से असहमति हो, तो उसकी चर्चा संबंधित व्यक्ति से उचित स्थान और समय पर करना अधिक उपयोगी है या इधर-उधर उसकी चर्चा करना—इस पर विचार करना चाहिए। यदि बात केवल क्षणिक क्रोध, व्यक्तिगत पसंद-नापसंद या आहत अहंकार से निकली है, तो उसे वहीं रोक देना ही समझदारी है। वाणी पर संयम स्वयं पर अधिकार का प्रमाण है।

इसका अर्थ समस्याओं को छिपाना या गलत बात पर मौन साध लेना नहीं है। समस्या को उचित माध्यम से उठाना ही सच्ची जिम्मेदारी है। सुधार के लिए कही गई बात घाव पर मलहम है और निन्दा घाव को कुरेदना। यदि व्यवस्था में कोई दोष है, तो उसे संबंधित व्यक्ति या उचित माध्यम के सामने रखना ही सार्थक है। परिवार में किसी से शिकायत हो तो उसे बाहर फैलाने के बजाय संबंधित व्यक्ति से संवाद करना संबंधों को बचाता है। सत्य बोलना आवश्यक हो सकता है, लेकिन सत्य को किस उद्देश्य से, किस भाषा में और किस स्थान पर कहा जाए—यह विवेक का विषय है। उद्देश्य निन्दा नहीं, सुधार होना चाहिए।

निष्ठा का अर्थ न हर बात को सही मान लेना है और न कमियों को छिपाना। सच्ची निष्ठा का अर्थ है—जिससे हम जुड़े हैं, उसके वास्तविक हित के प्रति ईमानदार रहना। कमी को दूर करने का प्रयास करना, गलती होने पर उसके समाधान में सहयोग देना और अनुचित निर्णय के प्रति सम्मानपूर्वक अपनी बात रखना—यही निष्ठा है। इसके विपरीत, अपनी नाराज़गी दूसरों में बाँटना, छोटी बातों को बढ़ाना, अफवाह फैलाना या अपने ही लोगों की प्रतिष्ठा को अनावश्यक रूप से कम करना समस्या का समाधान नहीं करता; वह केवल वातावरण को दूषित करता है। निष्ठा अंध-समर्थन नहीं, जिम्मेदार सहभागिता है।

किसी संस्था की प्रतिष्ठा केवल उसके भवन, नियम या नाम से नहीं बनती; वह उन लोगों के व्यवहार से बनती है जो उसका प्रतिनिधित्व करते हैं। सरकारी कार्यालय में नागरिक से व्यवहार, विद्यालय में शिक्षक का आचरण, आश्रम में आश्रमवासियों का एक-दूसरे और आगंतुकों के प्रति व्यवहार, अस्पताल में रोगी के प्रति संवेदनशीलता, व्यवसाय में ग्राहक के साथ ईमानदारी—ये सब संस्था की पहचान बनते हैं। इसी प्रकार परिवार की गरिमा भी उसके सदस्यों के परस्पर व्यवहार से बनती है।

इसका अर्थ झूठी प्रशंसा करना नहीं है। जहाँ जानकारी न हो, वहाँ “मुझे इसकी जानकारी नहीं है” कहना अधिक ईमानदारी है। जहाँ वास्तविक समस्या हो, वहाँ उचित व्यक्ति तक बात पहुँचाना अधिक जिम्मेदारी है और जहाँ बात केवल निन्दा बनकर रह जाए, वहाँ मौन अधिक गरिमापूर्ण है।

बहुत-से संबंध किसी बड़ी घटना से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे अनियंत्रित शब्दों से कमजोर होते हैं। क्रोध में कहा गया एक वाक्य वर्षों की निकटता पर भारी पड़ सकता है। परिवार की कोई निजी बात बाहर निकलकर ऐसा रूप ले सकती है, जिसे वापस लेना संभव नहीं होता। इसलिए कभी-कभी सबसे परिपक्व उत्तर कोई उत्तर न देना होता है। कुछ समय रुक जाना, मन को शांत होने देना और फिर बोलना—यह सरल अभ्यास अनेक अनावश्यक चोटों से बचा सकता है।

मौन समस्या से पलायन नहीं; प्रतिक्रिया पर विवेक को अधिकार देना है। जहाँ मौन अन्याय को बढ़ने दे, वहाँ मौन उचित नहीं। वहाँ सत्य और साहस आवश्यक हैं। विवेकपूर्ण जीवन का सूत्र यही है कि हम पहचान सकें—कब मौन सेवा है और कब बोलना जिम्मेदारी।

कुटुंब-परिवार में इसकी परीक्षा और भी गहरी होती है। अपने लोगों के साथ हम कभी-कभी बिना सोचे बोल देते हैं और उनकी बातें सहजता से बाहर कह देते हैं। हमारे संस्कार तब प्रकट होते हैं, जब हम अपने परिवार के सदस्यों की गरिमा की भी रक्षा करते हैं। परिवार में मतभेद स्वाभाविक हैं; सभी की प्रकृति, अपेक्षाएँ और दृष्टिकोण एक जैसे नहीं हो सकते। सम्मान का अर्थ दोष न देखना नहीं; दोष देखते हुए भी व्यक्ति की गरिमा बनाए रखना है।

एक सरल कसौटी यह हो सकती है—बोलने से पहले स्वयं से पूछें:

क्या यह सत्य है?

क्या यह आवश्यक है?

क्या यह सही स्थान और समय है?

क्या इससे सुधार की संभावना है?

यदि हम इन प्रश्नों को अपनी वाणी की कसौटी बना लें, तो हमारी बहुत-सी अनावश्यक बातें अपने आप समाप्त हो सकती हैं। शायद यही मौन का वास्तविक मूल्य है—वह केवल दूसरे की प्रतिष्ठा की रक्षा नहीं करता, हमारे अपने चरित्र की भी रक्षा करता है।

          जब हमारी वाणी में सत्य के साथ विवेक, असहमति के साथ सम्मान और निष्ठा के साथ सुधार की भावना जुड़ जाती है, तब हमारा बोलना भी और हमारा मौन भी सेवा बन जाता है।

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यू ट्यूब पर सुनें :

 https://youtu.be/NHp0XtZ48HI

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