जो अंधेरे में घुसने से कतराता है,
वह कभी प्रकाश को नहीं पा
सकता
खलील जिब्रान
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या देवी सर्व भूतेशु
हम प्रायः प्रकाश को किसी विशेष दिन या किसी विशेष पर्व से जोड़
देते हैं। दीपावली आएगी, तब दीप जलेंगे लेकिन जीवन ऐसा नहीं है। जीवन में
अँधेरा किसी तिथि की प्रतीक्षा नहीं करता। और न ही प्रकाश किसी कैलेंडर की तारीख
देखकर उतरता है। जब जीवन के सामने कोई कठिनाई खड़ी हो, परिस्थितियाँ
प्रतिकूल हो जाएँ, भीतर निराशा जन्म लेने लगे और संघर्ष लंबा
होता दिखाई दे—वही क्षण प्रकाश के जागरण का क्षण है।
यह सोच लेना कि अभी परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं हैं,
अभी विजय दूर है—अपने संघर्ष को भीतर से कमजोर कर देना है। अँधेरे
को देखकर प्रकाश की प्रतीक्षा करना एक बात है; और अँधेरे के
बीच स्वयं प्रकाश बन जाना दूसरी बात।
भारतीय चेतना में माँ दुर्गा शक्ति की अधिष्ठात्री हैं। वे केवल
किसी बाहरी युद्ध में असुरों का विनाश करने वाली देवी नहीं हैं। वे उस दिव्य शक्ति
का प्रतीक हैं जो मनुष्य के भीतर तब जागृत होती हैं,
जब वह भय, निराशा, बेबसी और लाचारी के
सामने झुकने से इनकार करती है। जब अँधेरा
बढ़ता है, तब शक्ति का आह्वान होता है। यही नवरात्रि का भी
गहरा संकेत है—देवी की आराधना के साथ भीतर सोई हुई शक्ति को जगाना। यह वह शक्ति है
जो कहती है—परिस्थिति चाहे जितनी भी कठिन हो, भीतर का प्रकाश
बुझने नहीं दिया जाएगा; संघर्ष का दीप प्रज्वलित होगा।
संघर्ष से बचना नहीं, संघर्ष के भीतर प्रकाश लेकर उतरना है।
माँ दुर्गा का स्वरूप भी हमें यही सिखाता है। शक्ति का अर्थ केवल सामर्थ्य रखना
नहीं; शक्ति का अर्थ है—सत्य के लिए खड़े होने का साहस।
जहाँ भय है - वहाँ निर्भयता; जहाँ दुर्बलता है - वहाँ संकल्प;
जहाँ असत्य का दबाव है - वहाँ सत्य के पक्ष में अडिग खड़े होने की
शक्ति।
माँ दुर्गा का अवतरण भी इसी अर्थ में हमारे भीतर घट सकता है। जब हम
अपनी सीमित शक्ति के भरोसे थककर बैठने के बजाय किसी उच्चतर शक्ति को पुकारते हैं,
तब हमारे भीतर एक नई ऊर्जा का जन्म होता है। वह ऊर्जा केवल
व्यक्तिगत उत्साह नहीं होती; उसमें एक गहरी, शांत और अजेय शक्ति का स्पर्श होता है। मनोबल केवल मानसिक हिम्मत नहीं है।
उसकी गहन गहराइयों में उतरना अपने भीतर छिपी उस शक्ति को खोज लेना है, जिसे हम कठिन समय में भूल जाते हैं। मनुष्य अपने बाहरी व्यक्तित्व से कहीं
अधिक विशाल है। उसके भीतर एक ऐसी चेतना भी है जो संकट के समय जाग सकती है।
यही वह क्षण है जहाँ “दुर्गा-शक्ति”
का सत्य स्पष्ट होता है। बाहर से देखने पर हम अकेले संघर्ष कर रहे होते हैं;
लेकिन भीतर उतरने पर अनुभव होता है कि हमारे पीछे कोई बड़ी शक्ति
खड़ी है। हमारी अपनी छोटी-सी इच्छा के पीछे एक विराट संकल्प जाग उठता है। “अतल” से उठने वाली वह हुंकार भीतर सोई हुई शक्ति की हुंकार है। यह भय की आवाज
नहीं, शक्ति-जागरण की आवाज है। माँ दुर्गा के हाथों में उठे
अस्त्र केवल बाहरी शस्त्र नहीं हैं; वे उस दिव्य संकल्प के
प्रतीक हैं जो अधर्म और अंधकार के सामने झुकता नहीं। यह संकल्प है—मैं
अँधेरे के सामने झुकूँगा नहीं।
तब नवरात्रि केवल माँ दुर्गा के आवाहन का पर्व नहीं रहती—वह अपने
भीतर उस शक्ति को जाग्रत करने का दिवस बन जाती है। वह हमारे जीवन की एक निरंतर
साधना बन जाती है। जब-जब अँधेरा आए, हम
प्रकाश की प्रतीक्षा न करें; अपने भीतर शक्ति का दीप
जलाएँ। उस दीप के पीछे यदि दिव्य शक्ति का आवाहन हो,
तो उसका प्रकाश साधारण मनुष्य के भीतर माँ दुर्गा के अवतरण का क्षण
बन जाता है। विजय केवल हमारी नहीं रहती; उसमें उस दिव्य
शक्ति का प्रकाश बोलता है, जो अँधेरे के बीच भी अपना मार्ग
बना लेती है।
बालकवि
वैरागी की ये पंक्तियाँ कहती है:
… यूँ कभी मत सोचिये दीपावली कुछ दूर है,
यह सोच ही संघर्ष की गति पर छिपा नासूर है।
ज़िन्दगी में सामना जब भी अँधेरे से हो कहीं ...
... इक दिया संघर्ष का फ़ौरन जला दो शान से,
...उस अतल से एक ही हुंकार ऊपर आयेगी
गीत अपनी जीत के
बस रोशनी ही गायेगी।
लेकिन
ऋषियों ने माँ दुर्गा के सिर्फ ‘शक्तिरूपेण’ को नमस्तस्यै नहीं किया है? -
बुद्धिरूपेण, मातृरूपेण, शान्तिरूपेण,
लक्ष्मीरूपेण, दयारूपेण, श्रद्धारूपेण,
क्षमारूपेण ...
को भी - नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै
नमो नमः॥ किया है।
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