बुधवार, 1 नवंबर 2023

सूतांजली नवम्बर 2023


 

कथनी नहीं – करनी

(श्री माँ, पांडिचेरी)

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हम खुद ही विश्व हैं                                                हम बदलेंगे युग बदलेगा

जी हाँ, हम ही संसार हैं और अगर युग को बदलना चाहते हैं तो हमें खुद को बदलना होगा। अगर खुद को बदलते हैं तब दुनिया अपने-आप बदल जायेगी।

          केशव, विचारशील दिमाग और सहानुभूति पूर्ण हृदय वाला पश्चिम में पढ़ा-लिखा  एक उत्साही युवा साधक है। वह मानव समाज में हर जगह फैली हिंसा और पीड़ा का असली अर्थ, उद्देश्य और उनके निराकरण का उपाय जानना चाहता है। वह भारत की आध्यात्मिक विद्या और ज्ञान तथा इस ज्ञान के आधुनिक प्रणेता श्री जनार्दन महाराज से बहुत प्रभावित है। श्री जनार्दन आधुनिक भारत के एक संत हैं जिन्होंने एक साधारण व्यापारी के रूप में अपना व्यवसाय करते हुए भी ज्ञान-मार्ग का उच्चतम स्तर हासिल किया है। हालाँकि संत जनार्दन बाह्य रूप से प्रेम करने वाले और दयालु हैं, वे अपने व्यवहार और बातचीत में कभी उदासीन और कभी कठोर भी हैं। उन्होंने मानव के शारीरिक कष्ट, पीड़ा या मृत्यु के लिए कभी किसी प्रकार की भावुकता, दया या सहानुभूति का प्रदर्शन नहीं किया।

          केशव जब भी भारत आते थे, संत जनार्दन के दर्शन करते थे और उनसे लंबी चर्चा करते थे। संत केशव के लिए गहरा और विशेष स्नेह महसूस करते थे। आज पड़ोसी देशों में हो रही साम्प्रदायिक हिंसा और उत्पात से केशव बहुत निराश था। जब वह संत जनार्दन से मिले, तो उन्होंने  पूछा, “महाराज, क्या आपने अखबारों में उन्मत्त, विचारहीन, नासमझ और बेवकूफी से किये गए नर-संहार  के संबंध में पढ़ा है? इस संबंध में आपके क्या विचार हैं?”  संत ने उदासीनता से कहा, “मैं समाचार पत्र नहीं पढ़ता और मेरी कोई राय भी नहीं है। वे टिमटिमाती छवियों की तरह हैं जो एक पर्दे पर दिखाई देती हैं और फिर गायब हो जाती हैं।”

          “महाराज, आप निर्दयी हैं”,  केशव ने कहा। “लोग हजारों की संख्या में मर रहे हैं और आप आराम से बैठे हैं और छवियों के बारे में बात कर रहे हैं! क्या आपको उनके प्रति सहानुभूति नहीं है?”

          जनार्दन ने शान्त स्वर में उत्तर दिया, “तुम्हारी जैसी सहानुभूति मुझमें नहीं है। तुम्हारी सहानुभूति क्या कर सकती है? क्या तुम्हारे ये तुक्ष अहं की अज्ञानतापूर्ण भावनाएँ इस संहार को रोक सकती हैं?”

          केशव ने आवेश से कहा “गुरुदेव मैं भावनाओं और कर्म का आदमी हूं। जब लोग मर रहे हों, मैं आपकी तरह यहां बैठकर दर्शनशास्त्र की बात नहीं कर सकता। मैं कुछ करना चाहता हूं”।  संत ने कुछ क्षण के लिए केशव की ओर एक उदार मुस्कान के साथ देखा और कहा, “तुम क्या कर सकते हो? अगर, तुम्हें पीड़ित लोगों की मदद करने का मन करता है तो जाओ और मदद करो। लेकिन जाने से पहले अपने उत्तेजित मन और हृदय को शांत करो। कुछ देर इस बात पर विचार करो कि उनकी मदद करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है? और उस मार्ग के बारे में बहुत स्पष्ट रहो।” एक पल की चुप्पी के बाद संत ने आगे कहा, “मैंने तुम्हें यह कई बार समझाया है कि जब तक लोगों के दिलों-दिमाग में हिंसा है तब तक बाहर की दुनिया में हिंसा रहेगी। तुम इसे रोक नहीं सकते क्योंकि तुम ही दुनिया हो।”

          “एक नियम और सिद्धांत के रूप में, हाँ, मैं आपसे सहमत हूँ, लेकिन उपाय क्या है?” केशव ने प्रश्न किया।

          “मैं इसे एक उदाहरण के साथ समझाता हूं”  संत ने कहा। “तुम एक थियेटर में हिंसा, पीड़ा, वध और कुरूपता से भरी फिल्म देख रहे हो। अगर तुम इसे किसी खूबसूरत चीज में बदलना चाहते हो तो तुम क्या करोगे? तुमको फिल्म के प्रोजेक्टर में सुंदरता और अच्छाई से भरी फिल्म से बदलना होगा। प्रोजेक्टर तुम्हारा अपना दिमाग है और फिल्म तुम्हारे विकास के दौरान जमा किए गए सभी विचारों, भावनाओं, आवेगों और कर्मों की छापों का संग्रह है। तुम जिस संसार को देखते और अनुभव करते हो, वह तुम्हारे अपने मन का प्रक्षेपण है, क्योंकि तुम ही संसार हो। अगर तुम दुनिया को बदलना चाहते हो तो तुम्हें प्रोजेक्टर में फिल्म बदलनी होगी। पर्दे पर मर रही और पीड़ित छवियों पर उत्तेजित होने का क्या फायदा? क्या यह छवियों की प्रकृति को बदल देगा?”

          प्रशंसात्मक मुस्कान के साथ, केशव ने कहा, “मुझे आपके रूपक पसंद हैं। वे मेरी समझ को परिपक्व बनाते हैं ... फिल्म को बदलना  ... जिसका अर्थ है ... परिवर्तन या चेतना का रूपांतर .. ... यह योग का यौगिक काल्पनिक आदर्श है। ठीक है, मैं सैद्धान्तिक रूप में सहमत हूं कि यह सभी मानवीय समस्याओं का अंतिम समाधान है। लेकिन यहां मुख्य समस्या यह है कि यह समाधान बहुत दूर का आदर्श है जो कई सहस्राब्दियों के बाद ही हो सकता है। तब तक, क्या हम बिना भावनाओं के पत्थरों की तरह बैठे रहें और मानव के कष्ट कम करने के लिए कुछ भी न करें?”

          “क्या मैंने ऐसा कहा?, संत ने पूछा, “यदि तुम भीतर से महसूस करते हो तो जाओ मदद करो। लेकिन इससे ज्यादा सहायता नहीं होगी, क्योंकि जब तक दुःख और पीड़ा के कारण अंदर रहेंगे वे बार-बार अलग-अलग अनेक रूपों में खुद को बाहरी रूप से व्यक्त करेंगे। लेकिन दूसरों की मदद करने में कुछ भी गलत नहीं है क्योंकि यह तुम्हें स्वयं के प्रति अपने आंतरिक विकास में मदद करता है। वास्तव में दूसरों की मदद करके तुम अपनी मदद कर रहे हो क्योंकि तुम ही दुनिया हो। महसूस करना और सहानुभूति प्रकट करना अच्छा है क्योंकि यह तुम्हारे दिल की पंखुड़ियों को प्यार करने के लिए खोलने में मदद करता है”।

          केशव ने कहा, “आप कह रहे हैं कि दूसरों की मदद करके मैं अपनी मदद कर रहा हूं! इस कथन में तो स्वार्थ की गंध है। आप तो बाहरी सहायता को इतने हल्के में ले रहे हैं और खारिज भी कर रहे हैं। अगर कुछ संस्थाएं बेरोजगारों के लिए कुछ स्थायी आजीविका खोजने में मदद करतीं, तो यह करुणा का एक बड़ा काम होता। आप इसे बेकार कहकर खारिज नहीं कर सकते क्योंकि यह इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।”

          “मैंने कभी नहीं कहा कि बाहरी मदद बेकार है”, संत जनार्दन ने जोर देकर कहा, “हर गतिविधि जो दुःख को कम करने में मदद करती है और लोगों की रहने की स्थिति में सुधार करती है सराहनीय है। उदाहरण के लिए शरीर में एक बीमारी का इलाज करने में, सबसे प्रभावी उपाय बीमारी के मनोवैज्ञानिक कारणों का पता लगाना है और उन्हें समाप्त करना है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आपको बाहरी दवाओं का उपयोग नहीं करना चाहिए, विशेष रूप से कम से कम दुष्प्रभाव वाले उपचारों से। वास्तव में, आंतरिक और बाहरी उपचार परस्पर विरोधी नहीं हैं, उनका एक साथ प्रयोग किया जा सकता है। लेकिन भारतीय आध्यात्मिक आदर्श आंतरिक उपचार में अधिक विश्वास रखता है जो एक सकारात्मक और स्थायी आंतरिक परिवर्तन की ओर ले जाता है।

          केशव ने विरोध किया, “नहीं, मैंने कहा कि मैं स्थायी दीर्घकालिक समाधान के रूप में आपके आदर्श से सहमत हूं। लेकिन, मैं भविष्य के आदर्श के बजाय वर्तमान के  कार्यों में अधिक विश्वास रखता हूं। क्या आप मुझे बता सकते हैं कि मैं आपके आध्यात्मिक आदर्श की ओर बढ़ने के लिए आंतरिक और बाह्य रूप से क्या कर सकता हूं?”

          संत ने कहा, “यह एक अच्छा प्रश्न है। बाह्य क्रिया के संबंध में, तुम जो कुछ भी गहराई से महसूस करते हो और अपनी प्रकृति, स्वभाव, मान्यता,  क्षमता के अनुसार कर सकते हो करो। तुमको लगातार याद रखना चाहिए कि तुम, बल्कि हम ही विश्व हैं। तुम और मैं और इस दुनिया में हर कोई, व्यक्तिगत रूप से और सामूहिक रूप से जो भी अंधकार, बुराई या पीड़ा देखते हैं उसके लिए जिम्मेदार हैं। यदि तुम दुनिया में हिंसा का अंधकार देखते हो, तो उस हिंसा का थोड़ा सा हिस्सा तुम्हारे स्वयं के भीतर है,  हो सकता है कि वह बाहरी क्रिया में न दिखता हो, लेकिन तुम्हारे अपने विचार, भावना, आवेगों, उद्देश्यों में हो। यदि तुम अपने भीतर के उस अंधेरे को खत्म कर सकते हो और इसे प्रकाश में बदल सकते हो, तो इसका समान प्रभाव बाहरी जीवन के अंधेरे पर पड़ता है।”

          “एक मिनट रुकिए”, केशव ने टोका, “क्या इसका मतलब यह है कि दुनिया के सभी चार अरब लोगों को वह करना होगा जो आप कह रहे हैं, यह एक बेतुका असंभव समाधान है?”

          “क्या यह एक बेतुका असंभव प्रश्न नहीं है?”, जनार्दन ने प्रतिप्रश्न किया, “मैं तुमसे बात कर रहा हूँ अरबों से नहीं। हर बड़ा परिवर्तन कुछ लोगों से शुरू होता है और धीरे-धीरे जनता में फैल जाता है। यहाँ भी तुम्हारे और मेरे जैसे कुछ लोगों को जीवन की गहरी सच्चाइयों के प्रति जागृत होना और उसका निरंतर अभ्यास करना पड़ता है।”

          कुछ लोग लाखों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं?”, केशव सवाल किया।

          “कोई भी इंसान एक द्वीप की तरह अकेला नहीं है”, संत जनार्दन ने समझाया “हम सभी एक छिपी हुई एकता से जुड़े हुए हैं। हमारा जीवन परस्पर एक दूसरे पर आश्रित है और एक दूसरे से जुड़ी हुई एकता का हिस्सा है। एक व्यक्ति की आंतरिक उपलब्धि और परिवर्तन का अन्य व्यक्तिगत केंद्रों पर प्रभाव पड़ता है। इससे अन्य व्यक्तियों एवं केंद्रों में भी आंतरिक उपलब्धि और परिवर्तन की क्षमता उत्पन्न होने या बढ़ाने में सहायक होता है।”

          “लेकिन महाराज, यह कई सहस्राब्दियों से चल रहा है”,  केशव ने अपने प्रश्न के साथ आगे कहा, “मानव सभ्यता की शुरुआत के बाद से आप जैसे कई संत और साधक आप जो कह रहे हैं उसका अभ्यास कर रहे हैं, लेकिन फिर भी दुनिया अंधेरा में डूबी हुई है।”

          संत ने धैर्य के साथ उत्तर दिया, “क्योंकि, इन गहन सत्यों का अभ्यास करने वालों की संख्या अभी भी कम है और अभी तक एक क्रिटिकल मास* (महत्वपूर्ण संख्या) तक नहीं पहुंची है।

(*क्रिटिकल मास – इसे समझने के लिये कह सकते हैं कि यह वह महत्वपूर्ण या न्यूनतम संख्या है जिसके बाद परिवर्तन की गति स्वतः तेज हो जाती है।)

इस महत्वपूर्ण संख्या (क्रिटिकल मास) तक पहुंचने के लिए, तीन शर्तों को पूरा करना होगा।

१ला - गहरे और उच्च आदर्शों को शिक्षा का एक अभिन्न अंग बनाना,

२रा - एक सामूहिक वातावरण, मानसिक और सामाजिक, जो इन उच्च आदर्शों को ग्रहण करने के लिए तैयार हो, और  

३रा - विचार और कर्म में एक ऐसा आदर्श नेता जो जीवन का एक जीता-जागता उदाहरण बने और और सचेत रूप से जीवन के हर क्षेत्र में इन आदर्शों को बढ़ावा दे और क्रियान्वित करे।

अब तक इन तीनों स्थितियों को पूरी तरह प्राप्त नहीं किया गया है।

“आपको क्या लगता है कि ऐसा कब तक हो सकता है?”

“मैं सटीक समय नहीं बता सकता। लेकिन मुझे लगता है कि समय आ गया है और अब यह ज्यादा दूर नहीं है।”

लगभग कितनी दूर?”

शायद कुछ शताब्दियाँ।”

कुछ शताब्दियाँ! यह कोई छोटी अवधि नहीं है”!

“यह तुम्हारे छोटे से दिमाग को लंबा समय लग सकता है। लेकिन प्रकृति के अरबों चक्रों में कुछ क्षणिक शताब्दियां कितना लंबा समय है?

तब, हमें अभी कुछ और सदियों तक भुगतना होगा!”

जिस दिन से हम वानर से मनुष्य के रूप में उभरे हैं, हम कई सहस्राब्दियों से पीड़ित हैं। तब कुछ और शताब्दियों के लिए क्यों नहीं...? यदि हम इस अवधि के दौरान, सिखाई गई सच्चाइयों के प्रति अधिक से अधिक ग्रहणशील हो सकते हैं, तो हम पीड़ा से मुक्त और शाश्वत शांति और आनंद से बनी जिंदगी जी सकते हैं।”

“अगर हम ऐसा कर सकते हैं... लेकिन अगर हम ऐसा नहीं कर सके ...”

जनार्दन ने टोकते हुए सख्ती से तेज आवाज में कहा, “रुक जाओ, हम इसके बारे में बात नहीं करते हैं, नकारात्मक सोच मानव प्रगति के लिए सहायक नहीं हैं। मेरे अकेले के करने से क्या होगा जैसी नकारात्मक सोच का त्याग करना होगा। यह सोचना और कल्पना करना बेहतर है कि अगर मानव जाति इसके लिए सहमत है तो हमारा भविष्य शानदार और भव्य होगा।”

“लेकिन, मुझे सपने देखने में कोई दिलचस्पी नहीं है।”

“क्या हमारे सर्वोत्तम सपने की प्रगतिशील प्राप्ति मानव की प्रगति नहीं है?”, संत जनार्दन ने पूछा। इस तरह का एक आशावादी सपना उन चमकदार भविष्य की संभावनाओं को प्रकट करने के लिए एक आह्वान और प्रार्थना की तरह काम करता है। एक महान रहस्यवादी और कवि के शब्दों में :  

“हमारे स्वप्न,

पंख वाले सत्य के घोड़े हैं,

सत्य के उन घोड़ों में

स्वर्ग को पृथ्वी पर लाने

की शक्ति है।”

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सिद्धि का लक्ष्य                                         छोटी कहानियाँ जो सिखाती हैं जीना

१९वीं शताब्दी के भारतीय सन्तों, सुधारकों और चिन्तकों में 'बादशाह राम' के नाम से प्रतिष्ठित संत थे। देशाटन करते हुए एक बार वे ऋषिकेश पहुँचे। उन दिनों मुनि की रेती से स्वर्गाश्रम आने-जाने के लिए नौकाओं की व्यवस्था थी। उन नौकाओं के मल्लाह उन दिनों गंगा पार करने का एक ओर की उतरायी का एक पैसा वसूल करते थे।  मुनि की रेती पर गंगा के किनारे स्वामी बादशाह राम नौका की प्रतीक्षा कर रहे थे कि एक तथाकथित पहुँचे हुए साधु उनके पास आये और बोले-“बादशाह राम! हमने तो सुना था कि तुम बड़े सिद्ध हो गये हो। तुम क्या अपनी सिद्धि के बल पर गंगा भी पार नहीं कर सकते? मुझे तो कोई जानता तक नहीं। परन्तु मुझे तो इतनी सिद्धि मिल गयी है कि में गंगा लाँघ सकता हूँ।"

          बादशाह राम मुस्कुरा उठे! बोले- "महाराज, यह जान कर बड़ी प्रसन्नता हुई। क्या आप बतायेंगे कि इतनी सिद्धि प्राप्त करने के लिए आपने कितने वर्षों तक निरन्तर साधना की है?" उन सिद्ध साधु ने तुरन्त उत्तर दिया- "लगातार तीस वर्षों की साधना के बाद मुझे यह सिद्धि मिली है। कहो तो गंगा को लाँघ कर दिखा दूँ।" स्वामी बादशाह राम पुनः मुस्कुराये; बोले- "तुम्हारी तीस वर्षों की साधना का इतना छोटा-सा फल मिला? तुमने गंगा पार करने का एक पैसा जाने का और एक पैसा लौटने का, कुल दो पैसे बचाये। यही साधना तुम किसी ऊंचे लक्ष्य की प्राप्ति के लिए करते तो कहीं कम समय में तुम्हें कहीं बड़ी उपलब्धि हो जाती।"

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रविवार, 1 अक्टूबर 2023

सूतांजली अक्तूबर 2023



खुद को अच्छा बना लीजिये
,

दुनिया से एक बुरा आदमी

कम हो जायेगा

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अर्चना और याचना

 आपने अपने परिवार के बड़े-बुजुर्गों को देखा होगा कि वे किसी भी मंदिर में दर्शन के बाद बाहर सीढ़ी पर, चौकी पर या आँगन में थोड़ी देर बैठते थे या बैठने के लिए कहते थे! क्यों?

          आजकल तो लोग मंदिर की पैड़ी (सीढ़ी) पर-आँगन में बैठकर अपने घर की, व्यापार की, राजनीति की चर्चा करते हैं। परंतु यह प्राचीन परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई। वास्तव में मंदिर की सीढ़ी पर बैठ कर के हमें एक श्लोक बोलना चाहिए। यह श्लोक है :

अनायासेन मरणम, बिना देन्थेन जीवनम् ।

देहान्त तब सानिध्यम्, देहि मे परमेश्वरम्।।

यानी, “बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो और हम कभी भी बीमार होकर बिस्तर पर पड़े-पड़े मृत्यु को प्राप्त न हों, चलते-फिरते ही हमारे प्राण निकलें। जब भी मृत्यु हो तब भगवान के सम्मुख हो, उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले। हे परम, परमेश्वर ऐसा वरदान हमें देना।”

परवशता का जीवन, यानी हमें कभी किसी के सहारे न रहना पड़े। जैसे कि लकवा हो जाने पर व्यक्ति दूसरे पर आश्रित हो जाता है, वैसे परवश या बेबस ना हों, ठाकुर जी की कृपा से बिना भीख के ही जीवन बसर हो सके, दूसरे की सहायता न लेनी पड़े। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं ठाकुर जी उनके सम्मुख आकर खड़े हो गए, वैसे ही उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले।

          सबसे बड़ा दुःख परवशता है, और इसकी कामना करनी पड़ती है, ठाकुर से इसके लिए गुहार करनी पड़ती है। संपत्ति, संतान, जीवन साथी, धन, ऐश्वर्य आदि मांगने की जरूरत नहीं है। ये तो सांसारिक लोगों से भी प्राप्त हो सकते हैं। लेकिन  जन्म और मृत्यु ही ऐसे हैं जिन पर हमारा कोई वश नहीं है। कब, कहाँ, कैसे  हमारा जन्म होगा, कोई नहीं जानता। वैसे ही कब, कहाँ और कैसे हमारी मृत्यु होगी कोई नहीं जानता। यह तो भगवान हमारी पात्रता के हिसाब से खुद हमको देते हैं। इसलिये  दर्शन करने के बाद बैठकर यही प्रार्थना करनी चाहिए। यह प्रार्थना है, याचना नहीं है। याचना सांसारिक पदार्थों के लिए होती है। घर, व्यापार, नौकरी, पुत्र, पुत्री, सांसारिक सुख, धन या अन्य बातों के लिए जो मांग की जाती है, वह याचना होती है। इनकी याचना हम ईश्वर के अलावा सांसारिक लोगों से भी करते हैं।

          हम प्रार्थना करते हैं, प्रार्थना का विशेष अर्थ होता है, अर्थात विशिष्ट, श्रेष्ठ, उनके अलावा और कोई हमें यह प्रदान नहीं कर सकता। । अर्चना अर्थात निवेदन।  ठाकुर जी से प्रार्थना करें और प्रार्थना क्या करना है, इस श्लोक का पाठ करना है।

          जब हम मंदिर में दर्शन करने जाते हैं तो खुली आंखों से भगवान को देखना चाहिए, निहारना चाहिए। उनके दर्शन करने चाहिये। आंखें बंद क्यों करना? हम तो दर्शन करने आए हैं। भगवान के स्वरूप का, श्री चरणों का, मुखारविंद का, श्रृंगार का संपूर्णानंद लें। आंखों में भर ले स्वरूप को, दर्शन करें और दर्शन के बाद जब बाहर आकर बैठे तब नेत्र बंद करके जो दर्शन किए हैं उस स्वरूप का ध्यान करें। और अगर ठाकुर जी का स्वरूप ध्यान में नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं और भगवान का दर्शन करें और उनके स्वरूप को हृदयंगम कर लें।  नेत्रों को बंद करने के पश्चात, उनका ध्यान करके उपरोक्त श्लोक का पाठ करें।

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गाँधी और गीता                                                 गांधी जयंती पर विशेष

गाँधी के 150वें जन्म वर्ष में मैंने अपने शहर के अनेक विद्यालयों में “कौन जानता गाँधी को?  शीर्षक से प्रश्नोत्तरी (क्विज) का आयोजन किया था। इस दौरान गाँधी को जानने-समझने वाले कई विद्वानों तथा गाँधी संस्थाओं से परिचय हुआ। गाँधी पर बहुत पढ़ना भी पड़ा, इस कारण गाँधी को भी जानने-समझने का अवसर मिला। इसका एक प्रभाव यह भी हुआ कि बहुत से लोग यह मनाने लगे कि मैं “गांधीवादी” हूँ। अब क्या कहूँ? “गाँधीवाद” जैसा न कोई वाद है और न संप्रदाय। गाँधी  ने खुद यह घोषणा की थी कि मेरे नाम से न कोई वाद है और न होगा। मेरी अपनी कोई बात नहीं है, मैं जो कुछ भी कहता हूँ, लिखता हूँ, वह दुनिया के हर कोने के धर्मगुरु, धर्मग्रंथ, विद्वान, चिंतक, लेखक, नेता  की ही बातें हैं, मेरी अपनी नहीं। अब तब फिर कहाँ से यह “गाँधीवाद” पैदा हो गया? लेकिन हाँ, यह सही है कि मैं गाँधी को मानता, उनके प्रति मेरी श्रद्धा है।

          इस कारण जब भी, किसी को भी, गाँधी के विरोध में, उनके पास जितनी भी और जैसी भी जानकारी होती है, सोशल मीडिया में मिलती है, मेसेज में आता है सब मुझे भेज देते हैं, मुझे बताते हैं और उसकी मुझसे चर्चा करते हैं। मैं उसका जवाब नहीं देता। मेरा मौन उन्हें बेचैन कर देता है। वे पूछते हैं, “तुम कुछ कह नहीं रहे हो, तो क्या तुम मानते हो यह सही है?”

“क्यों आपको क्या लगता है, मैं आपकी बात स्वीकार कर रहा हूँ?,” मैं प्रतिप्रश्न करता हूँ।

वे कहते हैं, “नहीं मुझे तो ऐसा नहीं लगता।

“मैं अगर कोई जवाब दूँ तो क्या आप मेरी बात मान लेंगे?, अब मैं प्रश्न करता हूँ।

“....”। उनसे न हाँ कहते बनता है न ना।

मुझे पता है कि वे मुझसे न जानना चाहते हैं न समझना। वे विचार विमर्श नहीं करना चाहते, न ही ज्ञान चर्चा, उनका उद्देश्य केवल या तो मुझे क्षुब्द करना है या मेरे विचारों को बदलना और अपनी बात को मनवाना।

अतः मैं कहता हूँ, “अब अगर हम जानते हैं कि इस मुद्दे पर हम एक दूसरे से सहमत नहीं होंगे तो क्यों इस पर बहस कर आपसी सम्बन्धों में कटुता पैदा करें? लेकिन अब तुमने विषय छेड़ दिया है तो यह जरूर कहूँगा कि अगर तुम्हारे लिए संभव हो तो व्हाट्सएप्प और सोशल मीडिया को छोड़ कर भी गाँधी को पढ़ो, जानो, समझो फिर बात करेंगे।” मेरे इस सुझाव से वे सहमत तो नहीं होते। उनके पास न पढ़ने का समय होता है न ही धैर्य, वे तो बस चलते-फिरते व्हाट्स एप को ही वैश्विक ज्ञान की खान मानते हैं। लेकिन बेबुनियाद बहस समाप्त हो जाती है।

दूसरों की कही बातों को सही न मानकर हमें खुद ही इसका विश्लेषण करना होगा, समझना होगा, गहराई तक जाना होगा तब ही गांधी को समझ पाएंगे। अभी कल की ही बात है, मैं अपने एक जीवन के मार्गदर्शक के पास बैठा था। मैं उनका आदर भी करता हूँ, और उनकी बातों को गंभीरता से भी लेता हूँ। मुझे यह भी पता है कि वे गाँधी के विरोधी नहीं हैं लेकिन उन्हें स्वीकार भी नहीं करते। उन्होंने बताया कि वे गीता के बारे में जानते हैं लेकिन कभी उसे पढ़ा नहीं  है। (दुर्भाग्य से ऐसे अनेक लोग मिलेंगे जिन्होंने गीता न पढ़ी, न समझी, न सुनी लेकिन पंडितों की तरह गीता पर बहस करेंगे।) लेकिन उनकी सुपुत्री, जो अमेरिका में डॉक्टर है, गीता पढ़ रही है और उससे बहुत प्रभावित है। उसने अपने पति को गीता का भाष्य दिया है और वे उसे पढ़ रहे हैं। उन्हें अच्छा लग रहा है। उससे प्रभावित हैं। मेरे लिए यह एक सुखद और आश्चर्यजनक खबर थी, क्योंकि वे अपने विचारों के बड़े कट्टर हैं। फिर उन्होंने कहा-

          “गाँधी ने कहा है कि साधन का भी उतना ही महत्व है जितना साध्य का। अगर साधन सही न हो तो साध्य कहीं-न-कहीं जाकर दूषित हो जाता है। लेकिन गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि साध्य हासिल करने के लिए साधन की चिंता न कर, उठो खड़े हो जाओ, इन शत्रुओं का संहार करो। इस प्रकार वे साध्य को ही महत्व दे रहे हैं, साधन को नहीं।” 

          मेरे लिए बड़ी विषम परिस्थिति हो गई।  यह बात तो समझ आ गई थी कि वे गीता अभी पढ़ना शुरू किए हैं और तो और दूसरे अध्याय तक ही पहुंचे हैं। गीता और उसके संदर्भ में गांधी पर टिप्पणी कर रहे हैं जिन्होंने  जीवन भर गीता पढ़ी, गुनी और साधी। बहस करना भी उचित नहीं लगा और न ही मौन रहना। मैंने संक्षेप में इतना ही कहा कि गाँधी और गीता जिस ऊंचाई पर हैं, गाँधी की जितनी साधना है, गाँधी का जितना अनुभव है उसकी तुलना में मैं कहीं नहीं हूँ, गीता जितनी सरल है उतनी ही कठिन भी, अपनी जिंदगी में मैं उसे पूरा समझ ही नहीं पाऊँगा, अतः उस पर भी किसी प्रकार की टिप्पणी करने  का दुःसाहस मैं नहीं कर सकता। सौभाग्य से उन्होंने भी बात को घुमा दिया।

          बात को सुलझते हुए देख मैंने भी दो प्रसंग और जोड़ दिये। मशीन के बहिष्कार को लेकर विश्व के अनेक लोग गाँधी से नाराज, मर्माहित और दुःखी थे। प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और निर्माता चार्ली चैपलीन, जो गाँधी के बड़े हिमायती थे, वे भी बड़े दुःखी हुए। मौका मिलते ही वे गाँधी से मिले और मशीन के बहिष्कार के मुद्दे पर उनसे चर्चा की। एक लम्बी चर्चा के बाद वे वहाँ से पूर्ण तरह गांधी के विचारों से सहमत हो कर निकले और उसके बाद अपनी प्रसिद्ध फिल्म द डिक्टेटर का निर्माण किया। अतः अब आज, जब गाँधी नहीं है तब उनके दृष्टिकोण की व्याख्या कौन करेगा? हम अगर उतनी ऊंचाई पर पहुंचे तथा उनकी जैसी दूरबीनी-दृष्टिकोण हो तभी समझ सकते हैं। अन्यथा उस पर टिप्पणी न कर अपनी अज्ञानता कबूल करना ही उचित है।

         गाँधी ने एक और बात कही थी। 100 में से 99 रास्ते अहिंसा के हैं एक आखिरी रास्ता हिंसा का है... लेकिन वो आखिरी है... और दुनिया के 99 मसले पहले 99 रास्तों से हल हो सकते हैं... कुरुक्षेत्र में युद्ध का शंख फूंकने के पहले श्रीकृष्ण ने अहिंसा से सुलह कराने के अनेक प्रयत्न किए। लेकिन हर प्रयत्न के असफल हो जाने के बाद ही युद्ध का निर्णय लिया गया। और जब यह निर्णय ले लिया गया, शंख फूँक दिये गए, उसके बाद पीछे हटना कायरता ही है। राम ने भी,  युद्ध का डंका फूंकने के पहले बिना युद्ध के मार्ग खोजने का प्रयत्न किया। लेकिन मार्ग न मिलने पर ही हिंसा का मार्ग अपनाया। गाँधी ने भी बार-बार यही कहा है कि अहिंसा कायरों का नहीं बहादुरों का हथियार है।

          गीता भी, जैसे-जैसे हम एक-के-बाद-एक अध्याय के पन्ने पलटते हैं, कई बार भ्रम पैदा करती है कि श्रीकृष्ण तो विरोधी बात कह रहे हैं। लेकिन विश्लेषण करने पर समझ आती है कि नहीं वे विरोधी बातें नहीं कर रहे हैं बल्कि दोनों मार्ग बता कर उनके दोष-गुण की चर्चा कर रहे हैं, सुगम और दुर्गम मार्ग की चर्चा कर रहे हैं। हर इंसान, दूसरे इंसान से अलग है। हर किसी को अपनी प्रकृति और प्रवृत्ति के अनुसार मार्ग का चयन करना चाहिए।  वह खुद अपना मित्र भी है और खुद ही अपना दुश्मन भी। गुरु मार्ग दिखा सकता है लेकिन चलना तो उसे खुद ही पड़ेगा।

          कैसी भी टिप्पणी करने के पहले खुद अपना विश्लेषण करना चाहिए। बिना समुचित अध्ययन और स्वाध्याय के टिप्पणी करना शोभा नहीं देता है।

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भाव और दृढ़ विश्वास                                     संस्मरण जो सिखाती है जीना

रामदासजी जब प्रार्थना करते थे तो कभी उनके होठ नहीं हिलते थे।

शिष्यों ने पूछा- हम प्रार्थना करते हैं तो होंठ हिलते हैं, आपके होंठ नहीं हिलते! आप पत्थर की मूर्ति की तरह खड़े हो जाते हैं। आप कहते क्या हैं अन्दर से? क्योंकि अगर आप अन्दर से भी कुछ कहेंगे तो होठों पर थोड़ा कंपन आ ही जाता है। चेहरे पर बोलने का भाव आ जाता है। लेकिन आपके चेहरे पर वह भाव भी नहीं आता

यह सुनकर सन्त रामदास जी ने कहा –

मैं एक बार राजधानी से गुजराराजमहल के सामने द्वार पर मैंने सम्राट को खड़े देखा और वहाँ एक भिखारी को भी देखा। वह भिखारी बस खड़ा था। फटे कपड़े थे उसके शरीर पर। जीर्ण-जर्जर देह थी, जैसे बहुत दिनों से भोजन न मिला हो, शरीर सूख कर कांटा हो गया। बस आँखें ही दीयों की तरह जगमगा रही थीं। बाकी जीवन जैसे सब तरफ से विलीन हो गया हो। वह कैसे खड़ा था यह भी आश्चर्य था? लगता था अब गिरा-तब गिरा ! सम्राट उससे बोले – बोलो क्या चाहते हो?

उस भिखारी ने कहा अगर आपके द्वार पर खड़े होने से मेरी मांग का पता नहीं चलता, तो कहने की कोई जरूरत नहीं। क्या कहना है? और मैं द्वार पर खड़ा हूँ, मुझे देख लो, मेरा होना ही मेरी प्रार्थना है।"

सन्त रामदास जी ने कहा - उसी दिन से मैंने प्रार्थना बंद कर दी। मैं परमात्मा के द्वार पर खड़ा हूँ।  वह देख लेंगे। मैं क्या कहूँ?

अगर मेरी स्थिति कुछ नहीं कह सकती, तो मेरे शब्द क्या कह सकेंगे अगर वह मेरी स्थिति नहीं समझ सकते तो मेरे शब्दों को क्या समझेंगे?

अतः भाव व दृड विश्वास ही सच्ची परमात्मा की याद के लक्षण है। यहाँ कुछ मांगना शेष नहीं रहता। आपका प्रार्थना में होना ही पर्याप्त है।

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शुक्रवार, 1 सितंबर 2023

सूतांजली सितंबर 2023

इंद्रियों से प्राप्त होने वाले सुख क्षणिक होते हैं,

अत: प्रतीत तो सुख होते हैं,

लेकिन दुख का कारण होते हैं।

सुख उसे कहते हैं, जिसमें दुख समाप्त हो जाता है।

स्वामी तेजोमयानंद

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दु:ख...?  

(दुख क्या है? जब तक हम यह नहीं पूछते, उत्तर जानते हैं, लेकिन जब पूछते हैं तब उत्तर नहीं जानते हैं। यह, वीणा के तारों की तरह, इतना न कसो कि टूट जाए, इतना  ढीला न छोड़ दो कि बज ही न पाए, जैसा मार्ग है। दुख क्या है, यह पूछते ही हम दुख से मुक्ति के उपाय खोजने लगते हैं। विद्वानों ने अनंत काल से कालानुसार अपने-अपने ढंग से इसे प्रतिपादित किया, इसके अनेक उत्तर दिये और अनुत्तरित भी छोड़ दिये। डॉ. देव  ने इनके उत्तरों को अनंत के गर्भ में से निकालने का प्रयास किया, लेकिन क्या ढूंढ पाये? अहा! जिंदगी ने उनके प्रयास को  हम तक पहुंचाया। इसके अंश।)

...मैं दुख का अनुभव अवश्य करता हूँ, समय अधिकांश दुख में ही कटते हैं, लेकिन मैं इसकी कोई परिभाषा नहीं कर सकता। हर किसी की अपनी परिभाषा है। कुछ लोग जो चाहते हैं कि उन्हें परम-बुद्धिमान दार्शनिक या मानव-मन का अध्येता मान लिया जाये, तो वे अवश्य दूसरों के लिये  दुख की परिभाषा अपनी उलझी हुई शब्दावली में करते हैं और उसे श्रवण या प्रकाशित होते देखने के लिये तरह-तरह के ओछे प्रयास भी करते हैं।

...मठों में तो दुख दूर करने का ही कारोबार है। ... हम लोग कभी नहीं पूछते कि दुख क्या है? दुख के संदर्भ में हमेशा हमारा सवाल क्यों और कैसे की शैली में पूछा जाता है और कुछ लोग दुख दूर करने वाले बाजार सजा लेते हैं। कुछ लोग तो केवल दुख दूर करने का उपाय बताते हैं, कुछ तो उपाय कर भी देते हैं। कहने का मतलब कुछ गुरु, गुरु ही रहते हैं, कुछ गुरु ईश्वर के समकक्ष हो जाते हैं। गुरुओं के प्रारूप देश, काल और परिस्थिति के अनुसार बनते हैं। अगर मुझे पता चल जाये कि दुख क्या है तो मैं दुख से मुक्त हो जाऊंगा। हम जिसे जान लेते हैं, उससे मुक्त हो जाते हैं।

... दुख के बारे में उपनिषद कोई साफ बात नहीं कहते, लेकिन दुख क्या है, इसका उत्तर वे देते हैं। वे कहते हैं, अज्ञान ही पाप है। ... पाप से दुख उत्पन्न होता है। आंतरिक जगत में भी और समाज में भी। ऋग्वेद उनके पहले ही कह गया है, पापी नरक-स्थान को उत्पन्न करता है। ... कुल मिलकर अज्ञान ही दुख है। तो फिर, अज्ञान क्या है? अपने को न जानना ही अज्ञान है। अपने को जानते ही मनुष्य दुख से तो मुक्त हो ही जाता है। सुख-दुख से परे अनंत आनंद में भी निवास करने लगता है। दुख को जानना दुख के मूल कारण को जानना है। ...उपनिषदों की दुख की परिभाषा गढ़ने में कोई रुचि नहीं है। उपनिषद कभी हमें खुल कर नहीं बताते कि दुख क्या है? वे केवल आनंद को जानते हैं। वे मनुष्य को मूलतः अनंत आनंद के बारे में बताते हैं। कहा जाये कि वे जीवन मात्र को अनंत आनंद घोषित करते हैं। और श्रावण-मनन-निदिध्यासन की तकनीक से उस अक्षय, अमर, अनंत आनंद में निवास करने की कला सिखाते हैं।...

...उपनिषदों के ऋषि गृहस्थ हैं। वे ब्रह्मचर्य आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने, गृहस्थ आश्रम में परिवार के प्रति कर्तव्य पूरा करने, वानप्रस्थ में समाज सेवा करने और संन्यास में प्रकृति सहित समूचे संसार को समर्पित होने के क्रम को अनिवार्य मानते हैं।... वे संसार का त्याग करना नहीं सिखाते। संसार से जुड़ते हुए वे काल से मुक्त होने की कला में माहिर थे और यही कला सिखाने को कटिबद्ध भी हैं। वे संसार को माया या तृष्णा नहीं मानते। वे नहीं मानते कि हम मायाजाल में फंसे हैं या तृष्णा में पड़कर अनंत बार जन्म-मरण को बाध्य होते हैं। वे अविद्या की बात अवश्य करते हैं। अविद्या के चलते ही हम दुख में होते हैं। विद्या हमें मुक्त करती है। वे जीवन को दुख नहीं मानते, जीवन को आदि-मध्य और अनंत में केवल आनंद ही मानते हैं। वे अनुभववादी हैं।...

          आधुनिक मनुष्य और उपनिषदों के बीच सदियों की पथरीली दीवार खड़ी है। ... उपनिषदों की भाषा हमारी समझ के बाहर हो गई है। तब पलखत पाकर अर्थात पलक झपकने भर का मौका पाकर  बुद्ध लगातार दिमाग के भीतर दस्तक देने लगते हैं। ... जब उन्होंने दुख को पहचाना, तो पाया कि जीवन दुख का ही पर्यायवाची है। ... जो है वह दुख ही है, दुख के अलावा और कुछ है ही नहीं। अस्तित्वमात्र ही दुख है। जीवन और दुख एक ही सत्ता के दो नाम हैं। भौतिक शरीर ग्रहण  करने के साथ अजन्मा, अजर-अमर-अमर्त्य आत्मा भौतिक शरीर में निवास करने लगेगी तो हम दुख से कैसे मुक्त हो पायेंगे। ये उपनिषद वाले तो अनंत जीवन की बात कर रहे हैं। अनंत जीवन केवल दुख के अलावा और कुछ हो ही नहीं सकता, क्योंकि जीवन मात्र दुख के और कुछ हो ही नहीं सकता, क्योंकि जीवन मात्र दुख ही है। जन्म लेना दुख है, रोग दुख है, जरा दुख है, मरण दुख है, प्रिय से विछोह दुख है, अप्रिय से मिलन दुख है, जीवन का हर क्षण दुख है, दुख ही है और कुछ भी नहीं है। वाकई दुख के बारे में बुद्ध से बड़ी अथॉरिटी और कोई नहीं है।...

          ... अर्जुन हमारी ही तरह विषादग्रस्त है, दुख की पराकाष्ठा का अनुभाव कर रहा है। मृत्यु उसे आकर्षक लगने लगी है। वह संन्यास लेने को तत्पर है। इससे निवृत्ति का एकमात्र मार्ग संन्यास ही है। ... अपने धर्म का पालन करो, अपने लिए नियत कर्म करो, लड़ो, उन्हें मारो, ये अधर्म के पक्ष में खड़े हैं’, कृष्ण डांटते हैं। गीता के प्रारम्भ में अर्जुन गाँडीव रख देता है, गीता के अंत में वह धनुष उठा लेता है। अतः गीता का एक ही उपदेश है - अपनी प्रकृति और नियति के अनुसार कर्म करो, कर्म में ही सारा ध्यान झोंक दो, फल के बारे में एक पल के लिए भी विचार मत करो, वह तो शुद्धतः तुम्हारे कर्म का परिणाम होगा। शत-प्रतिशत कर्म, शत-प्रतिशत फल। श्रम का रंच मात्र भी फल-विचार में गया कि फल में उतनी ही कमी रह जाएगी। लेकिन, कर्म हमेशा फल को लक्ष्य में रखकर ही किया जा सकता है। लक्ष्य में फल को रखे बिना हम  अपना स्वधर्म यानि स्वकर्म नियत कर ही नहीं सकते, कर्म क्या करेंगे? कर्म के लिए कृष्ण दो लक्ष्य सामने रखते हैं। आधुनिक मनुष्य को पहला लक्ष्य ईश्वर को सभी कर्मों का समर्पण समझ में नहीं आयेगा। वह अपनी ओर से ईश्वर को समर्पित करेगा, लेकिन उसके कर्म समाज का संचालन करने वाले स्वार्थी सत्ता-केन्द्रों को समर्पित हो जाएंगे। समाज में चारों तरफ बिखरे घड़ियाल उसके फल को गटक जाएंगे। आत्मशुद्धि वाला लक्ष्य भी तब तक समझ में नहीं आएग जब तक वह स्वयं को प्रेम करो जैसे सत्तापक्षीय सिद्धांतों की चपेट में है। 

... जीवन दुख नहीं है। जीवन माया नहीं है। जीवन मृत्यु की ओर बढ़ती नदी नहीं है। जीवन जीने के लायक नहीं है, हम ऐसा इसलिए सोचते हैं क्योंकि हम अविद्या से ग्रस्त हैं। जब हमें विद्या मिलती  है तो हम ब्रह्मांड से एकत्व का अनुभव करने लगते हैं और पाते हैं कि दुख सम्पूर्ण से कटे होने का प्रतिफल है। जीवन तो वस्तुतः आनंद है, अनंत आनंद...सत-चित-आनंद।

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इष्ट देवता – क्या , क्यों और क्या है महत्व

सबसे पहला प्रश्न तो यह है कि यह इष्ट देवता क्या है?

          मोटे तौर पर इष्ट देवता का अर्थ है एक भक्त द्वारा अपनी व्यक्तिगत दृष्टिकोण या भावनात्मक लगाव के अनुसार भक्ति, पूजा और आराधना के लिए चुने गए देवता का नाम और स्वरूप।

अब, इसके तुरंत बाद दूसरा प्रश्न जो हमारे दिमाग में आता है वह है कि इस इष्ट देवता की क्या उपयोगिता है?

          सही तौर पर विचार करें तो इसके भी पहले यह समझना ज्यादा आवश्यक है कि जब और किसी धर्म में किसी देवता की कल्पना नहीं है हमारे धर्म में देवता की कल्पना ही क्यों की गई है?

          इसका सीधा सा कारण है कि जहाँ मनुष्य के लिए अपने भीतर की किसी अनदेखी चीज़ पर विश्वास करना कठिन होता है, वहीं उसके लिए किसी ऐसी अनदेखी चीज़ पर विश्वास करना आसान होता है जिसे वह अपने से बाहर मानता है। अतः अपनी आध्यात्मिक प्रगति के लिए अधिकांश मनुष्य अपने से बाहर अपने विश्वास की किसी वस्तु की मांग करता है। उसे ईश्वर की एक बाहरी छवि या एक मानव प्रतिनिधि की आवश्यकता होती है  - वह अवतार या पैगंबर या गुरु  या दोनों की मांग करता है और उन्हें खोजता है। मानव आत्मा की आवश्यकता के अनुसार भगवान स्वयं को देवता, दिव्य मानव या सरल मानव के रूप में प्रकट करते हैं - इस स्थूल वेश में वे सफलता पूर्वक अपने ईश्वरत्व को छुपा कर ईश्वरत्व के मार्गदर्शन का हस्तांतरण करते हैं।

          हिन्दू का आध्यात्मिक शास्त्र, इष्ट देवता, अवतार और गुरु की धारणाओं द्वारा आत्मा की इस आवश्यकता को पूरा करता है। इष्ट देवता से, एक चुने हुए देवता का अर्थ कोई हीन शक्ति नहीं, बल्कि पारलौकिक और सार्वभौमिक देवत्व का एक नाम और रूप है। ईश्वर सर्व है और सर्व से बढ़कर है। लेकिन वह जो सबसे बढ़कर है, मनुष्य कैसे उसकी कल्पना करेगा, विचार करेगा, सोचेगा? सर्व में ऐसी चीजें हैं जो उसकी समझ के लिए बहुत कठिन है। सीधे तौर पर, वह ईश्वर के रूप में कल्पना नहीं कर सकता है, उस तक नहीं पहुंच सकता है या किसी ऐसी चीज को नहीं पहचान सकता है जो उसकी अज्ञानी या आंशिक धारणाओं के दायरे से बहुत बाहर है। उसके लिए यह आवश्यक है कि वह ईश्वर को अपनी छवि में या किसी ऐसे रूप में देखे जो स्वयं से परे हो लेकिन उसकी उच्चतम प्रवृत्तियों के अनुरूप हो और अपनी भावनाओं या अपनी बुद्धि द्वारा समझ सके और उसे मान सके। अन्यथा उसके लिए परमात्मा के संपर्क और साम्य में आना मुश्किल है।

          एक भारतीय ग्रंथ है, राम भक्त विजयम, जो तुलसीदास की एक पौराणिक जीवनी जैसी प्रतीत होती है। इस ग्रन्थ में तुलसीदास हनुमान से राम के दर्शन कराने का अनुरोध करते हैं। हनुमान कहते हैं, आप राम के दर्शन कैसे कर सकते हैं वे तो निराकार, सार्वभौमिक, सर्वव्यापी हैं, जो हर जगह और हर चीज़ में हैं और सबसे ऊपर हैं, अंतरिक्ष और समय से परे शाश्वत हैं।” तुलसीदास उत्तर देते हैं, “मैं उस परम पुरुष के दर्शन राम के रूप में करना चाहता हूं।” हिंदू धर्म में इष्ट देवता का यही अर्थ है, एक सीमित व्यक्तिगत देवता नहीं, बल्कि पारलौकिक और सार्वभौमिक दिव्यता का एक नाम और रूप।

          गुरु या अवतार भी इष्ट देवता हो सकते हैं। ऐसी स्थिति में भक्त या शिष्य को अपने गुरु या अवतार को केवल मनुष्य के रूप में नहीं बल्कि स्वयं परमात्मा को मानव रूप में देखना होता है। एक प्रसिद्ध श्लोक है –

गुरुर्ब्रह्मा ग्रुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही शंकर है; गुरु ही साक्षात् परब्रह्म (परमगुरु) है;

उन सद्गुरु को प्रणाम।

          ईश्वर को तीन अवस्थाओं में मानते हैं: पारलौकिक, सार्वभौमिक और वैयक्तिक। राम, कृष्ण, क्राइस्ट और बुद्ध जैसे दिव्य अवतार पारलौकिक और सार्वभौमिक दिव्य के अवतार हैं। प्रत्येक मनुष्य उस वैयक्तिक को परमात्मा के अवतार के रूप में देख सकता है, जो एक दिव्य उद्देश्य के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुआ है। हममें से अधिकांश लोग इसके बारे में या अचेतन अवतार से अवगत नहीं हैं। जो लोग अपने भीतर परमात्मा के बारे में पूरी तरह से जागरूक हो गए हैं और उनके साथ एकजुट हो गए हैं, वे पृथ्वी पर रहने वाले देवता हैं।

          लेकिन यह सिद्धांत पूरी तरह से केवल आत्म-साक्षात्कार या ईश्वर-प्राप्त आत्माओं जैसे श्रीअरविंद, श्री रामकृष्ण या श्री रमण महर्षि आदि पर लागू होता है। लेकिन, ऐसे सैकड़ों गुरु हैं जिन्होंने ईश्वर को महसूस नहीं किया होगा, लेकिन चेतना के कुछ उच्च स्तरों या सामान्य मानव चेतना से परे एक उच्च शक्ति के साथ उनका कुछ आंतरिक संपर्क है, जो शिष्यों को आकर्षित करता है। ऐसे मामलों में भी, यदि शिष्य अपना ध्यान गुरु की ईश्वरीयता पर केंद्रित करता है, गुरु में मानव के दोषों को अनदेखा करता है, तब गुरु में अवस्थित ईश्वर उसे सही रास्ते का मार्गदर्शन करेगा भले ही गुरु में मानवीय खामियां हों। उदाहरण के लिए, एक प्राचीन भारतीय ग्रंथ शिष्य से कहता है, अपने गुरु की खामियों को मत देखो। उनमें से सत्य को लो, और बाकी को छोड़ दो।”

          यदि हमारे एक इष्ट देवता हैं, तो हमारी आंतरिक आकांक्षा को परम ईश्वर के संपर्क में आना होगा और बाहरी रूप के पीछे उनकी उपस्थिति को अनुभव करना होगा।

(दुर्भाग्य से पिछले कुछ समय में कुछ ऐसे गुरुओं की खामियां अपराध के दायरे तक पहुँच गई। जिसका परिणाम उन्हें तो भोगना हो पड़ा हमें भी उसकी तपन महसूस हुई।)

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