शुक्रवार, 1 दिसंबर 2023

सूतांजली दिसम्बर 2023


 अहंकार से प्राप्त ज्ञान अहंकार पैदा करता है,

विनय और नम्रता से प्राप्त ज्ञान नम्रता प्रदान करती है।

स्वामी तेजोमयानंदजी (गीता)

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छुटकारा – पाप से या दुःख से?                                             मैंने पढ़ा

मनुष्य बड़ा विचित्र प्राणी है!

अपराध खुद करता है, लेकिन चाहता है दंड किसी और को मिले!

जीत का सेहरा खुद के सिर पर, लेकिन हार का ठीकरा किसी और के सिर पर।

पुण्य का फल खुद के लिए लेकिन पाप का दंड किसी और के लिए?

है न विचित्रिता!

          हम कोई तरकीब चाहते हैं कि पाप तो कर लिये, लेकिन पाप के फल से बच जाऊँ। कोई मंत्र, कोई चमत्कार, कोई पूजा-पाठ, कोई दर्शन, कोई स्नान, कोई दान हमें छुटकारा दिला दे। कौन छुटकारा दिलायेगा? और ऐसा भी नहीं है कि समझदार पुरुषों ने हमें बार-बार, हजारों बार न कहा हो कि ठहरो, रुक जाओ। यही नहीं, ऐसा भी नहीं है कि आज भी वे ह से कह रहे हैं तो, मैं रुक जाऊंगा, म करते ही रहेंगेपिछले जन्मों में करते रहे हैं, अभी भी कर रहे हैं और आगे के जन्मों में भी करते रहेंगे। और फिर यह विचार करेंगे कि क्या अनंत जन्मों तक किये हुपाप का फल क्या अनंत जन्मों तक भोगने पड़ेंगे? हम निरंतर करते चले  जाते हैं और फिर असंभव की आकांक्षा करते हैं। पाप तो म करें और फल हमें न मिले, फल किसको मिलेगा फिर? अगर दुःमैंने बोया है तो उसकी फसल कौन काटेगा? और यतो सरासर अन्याय होगा कि फसल किसी और को काटनी पड़े। फसल तो मुझे ही काटनी पड़ेगी!

          इस बात की चिंता छोड़ो कि कितना समय बीत चुकाजब जागो तभी सवेरा। ऐसा नहीं है कि जितने समय दुःख बोया है उतने ही समय दुःख भोगना पड़ेगा। लेकिन दुःख भोगने के लिए तैयार तो होना पड़ेगा। इस सोच से तो निकलना पड़ेगा कि दुःख भोगना ही न पड़े। इस तैयारी में ही छुटकारा है। कहना तो यही चाहिए कि ‘चाहे कितना ही समय लगे, जो मैंने किया है उसे भोगने के लिए मैं राजी हूँ, चाहे अनंत काल लगे’। अपनी तरफ से तैयारी तो दिखानी ही होगी और यही हमारा सौमनस्य होगा, सद्भाव होगा, ईमानदारी होगी, प्रमाणिकता होगी। हमें यह कहना ही चाहिए कि जब मैंने फसल बोहै, तो मैं कटूँगा, और जितनी बोहै उतनी काटूंगा। इसमें किसी और पर मैं जिम्मेवारी नहीं देता। और न कोई ऐसा सूक्ष्म रास्ता खोजना चाहता हूँ कि किसी तरह बचाव हो जाए। किसी रिश्वत से नहीं, किसी दबाव से नहीं, किसी की प्रार्थना से नहीं, मेरे किये का फल मुझे मिलना ही चाहिए।

म तैयारी तो दिखाएँ। अगर हमारी तैयारी सच्ची है, निर्मल हृदय से है, तो एक बात समझ लेनी चाहिए, दुःख का संबंध विस्तार से नहीं, गहराई से है। दुःख के दो आयाम हैं - लंबाई और गहराई। बात सरल और सीधी सी है, अगर एक कटोरी जल को एक छोटी-सी शीशी में डाल दें तो जल की गहराई बढ़ जाती है लेकिन अगर उसे फर्श पर फैला दें तो उसकी गहराई समाप्त हो जाती है। लेकिन वह पूरे फर्श पर फैल जाती है और उसकी लंबाई बढ़ जाती है। हमने जो पाप लंबे समय तक किए हैं, कई जन्मों तक किये हैंलेकिन अगर तैयार हैं झेलने को, तब उसका दर्द हम लंबे समय तक न भोग कर गहरा भोग कर,  झेल कर समाप्त कर सकते हैं। साल भर का सिरदर्द एक क्षण में भी झेला जा सकता है। पीड़ा सघन हो सकती है, प्राणांतक हो सकती है।

          यह एक बड़े आश्चर्य की बात देखने-सुनने में आती है कि रामकृष्ण कैंसर से मरे, रमण भी कैंसर से रे, महावीर बड़ी गहन उदर की बीमारी से मरे, बुद्ध शरीर के विषाक्त होने से मरे, ऐसे महापुरुष, ऐसे पूर्णज्ञान को उपलब्ध लोग ऐसी संघातक बीमारियों से मरे? जँचता नहीं। और यहां करोड़ों है, महापापी, जो बिना कैंसर के मरेंगे। तो उनके भाग्य में ऐसा क्या लिखा है? अक्सर ऐसा हुआ है कि जिस व्यक्ति का आखिरी क्षण आ गया, इसके बाद जिसका जन्म नहीं होगा, यउनका शरीर से आखिरी संबंध है। तब उनकी पीड़ा सघन हो जाती है, ताकि एकत्रित सारे पाप का दुःख गहरा हो जाये और फिर जनम न लेना पड़े, अन्यथा सिर्फ उन दुःखों को भोगने के लिए फिर से जनम लेना पड़ेगा। हम वर्षों-वर्षों और जन्मों-जन्मों तक भोगते हैं, वे क्षण में भोग लेते हैं। क्योंकि तीव्र पीड़ा को झेल लेना मुक्त हो जाना है। यह जरूरी नहीं कि हमें उतने ही जन्म लेने पड़ेंगे जितने जन्म तक हमने पाप किए हैं। और अगर हम तटस्थ भाव से इसे भोग सकें तो एक क्षण में जन्मों-जन्मों की कथा समाप्त हो जाती है।

          प्रार्थना मत कीजिये। अगर करनी ही है तो दुःख हरने या कम करने के लिए नहीं बल्कि पाप न करने की कीजिये। दुःख परिणाम है और पाप कारण। अगर कारण मिट गया तो परिणाम स्वतः मिट जायेगा। प्रार्थना में क्षमा मत मांगिये, दंड मांगिए। अगर पाप करते समय उसे नहीं बुलाया तो अब भोगते वक्त किस मुंह से उसे बुलाओगे? पाप करने से रोकने नहीं बुलाया तो अब दंड भोगते समय उसे क्यों बुला रहे हो। उचित यही है कि उसे अब दंड देने बुलाओ।

         एक बात और कहूँगा, दंड का विरोध मत करो, उसके आगे समर्पण करो। विरोध में  शक्ति लगेगी; अवसाद, क्रोध, अशांति घेर लेंगी। समर्पण में सहजता आ जाएगी; निश्चिंतता, क्षमा, शांति का निवास होगा। हम सोचते हैं कि एक तो पुनर्जन्म अपने आप में एक कारा-गृह का दंड है और फिर ये दुःख? ये क्या सजा के साथ-साथ जुर्माना है? लेकिन सत्य तो यही है कि किसी ने हमें कारा-गृह में नहीं डाला है। हम खुद बेहोश हैं। मोक्ष कहीं आकाश में, क्षीर सागर में, सात-समुंदर पार नहीं है, हमारे भीतर ही है। बस बेहोश मत होइये, जागृत रहिये। अपने कर्मों को भोगने के लिए तैयार रहिए।  मोक्ष पाने की नहीं, मोक्ष धरा पर अवतरित करने की आकांक्षा रखिये।

(ओशो पर आधारित)

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रचना-कार

आड़े-तिरछे, टेढ़े-मेढ़े, गोल-लंबे आकृतियों को जब एक विशेष क्रम में सजाते हैं तो उससे उत्पन्न होता है अक्षर

अलग-अलग अक्षरों को किसी विशेष क्रम में सजाते हैं तब जो आकृति उभर कर आती है वह कहलाती है शब्द

इन शब्दों को एक अनुशासन में बांधने से बनता है वाक्य

और जब इन वाक्यों को पिरोते हैं खूबसूरती से तब निर्माण होता है एक रचना का।

लेकिन बात यहाँ समाप्त नहीं होती, आगे चलती है।

जब यह रचना लोगों तक पहुँचाने की व्यवस्था करते हैं तब रचना का वितरण होता है,

और सही ढंग से वितरित होने से यह रचना पहुँचती है सही पाठकों के हाथों में।

तब वह रचना सार्थक होती है।

मैंने अपने एक फ्रांसीसी परिचित को एक हिन्दी रचना भिजवाई। मिलने पर उसने भी मुझे एक फ्रांसीसी रचना  भिजवाई साथ में बताया कि आड़ी-तिरछी महीन रेखाओं से बनाई हुई कलाकृतियों की पुस्तक उसे मिली और पसंद आई लेकिन उसे ऐसा प्रतीत हुआ कि उसमें कला कृतियों की  बार-बार आवृति की गई है यह समझ नहीं पाया कि ऐसा क्यों है?’

यह पूरा कार्य जब उत्तम एवं सही तरीके से, मेहनत और पूरी लगन के साथ की जाती है तब वह बनती है कालजयी रचना। इनमें से एक में भी गड़बड़ हुई, आलस हुआ, छूट गया, समुचित ढंग से नहीं हुआ तो वह सार्थकता उपलब्ध नहीं होती जो उस रचना के उपयुक्त है।

          यह कोई पुस्तक हो, संगीत हो, कला हो, वार्ता हो, खेल हो, फल हो, पुष्प हो, वस्तु हो, निर्माण हो, प्रकृति कृत हो या मानव कृत सब पर कमोबेश लागू होती है। अंदाज़ लगायें किसी की भी सफलता के लिए कितना कुछ करना पड़ता है, यही नहीं यह सब आदि से अंत तक हमारे हाथ में नहीं है, यह एक संयोग से होता है। यह संयोग क्या होता है, कैसे होता है, क्यों होता है? इसका कोई एक निश्चित उत्तर नहीं है। विज्ञान और अध्यात्म दोनों इसके उत्तर खोज रहे हैं, अपने-अपने ढंग से, कोई विश्लेषण से कोई संश्लेषण से, कोई जोड़ कर कोई तोड़ कर। अनेक उत्तर हैं, सब के अपने-अपने। किस को सही मानें किसको गलत यह आपकी प्रवृत्ति है। 

          कोई जोड़ किसी तोड़ की तैयारी थी या कोई तोड़ किसी जोड़ की, इसका तो पता चलता है पूर्णाहुति पर ही है। आज अपनी पत्रिका को अंतिम रूप देकर समाप्त करना था। प्रायः इसे सम्पन्न करने में रात 8-9 बज जाते हैं। लेकिन आज कार्य समय के पूर्व ही सम्पन्न हो गया, 6 बजे। इत्तिफ़ाक से! पत्रिका में एक पुस्तक, ‘द ग्रेट अडवेंचर  से एक पन्ना दिया करता हूँ, आज भी दिया लेकिन बंद करते-करते उस पुस्तक के अंतिम पन्ने पर, जिसे नहीं भेजना था, अचानक ध्यान चला गया जिसमें एक छोटा सा एक पन्ने का उद्धरण पढ़ने लगा और मुझे वह बहुत अच्छा लगा। इसके बावजूद भी समय काफी था, अतः सोचा की चलूँ शाम की सैर कर लूँ, थोड़ी लंबी सैर करके वापस आऊँगा। निकलने के पहले एक आवश्यक फोन करना था, सोचा उनसे बात करके ही निकलूँ। लेकिन शायद वे उस समय व्यस्त थे अतः उन्होंने कहा कि वे दस मिनट बाद फोन करेंगे। इत्तिफ़ाक से! मैं 10 मिनट कमरे में नहीं रहना चाहता था अतः छोटा हलका वाला (बेसिक) फोन के बदले बड़ा भारी वाला (स्मार्ट) फोन लेकर निकल पड़ा क्योंकि फोन इसी से किया था तो फोन इसी पर आता। सैर के दौरान बात हो गई। सैर समाप्त होने के बाद साधारणतया मैं कमरे में जाकर थोड़ा आराम कर, पानी वगैरह पीकर आता हूँ। लेकिन आज वैसा कुछ महसूस नहीं हुआ और ध्यान-केंद्र में  जाने की इच्छा हुई तो सीधे उसी तरफ आगे बढ़ गया। मैं रोज वहाँ नहीं जाता और फोन भी लेकर नहीं आता लेकिन आज सीधे आया था अतः फोन जेब में ही था। इत्तिफ़ाक से! सोचा कि प्रवेश करने के पहले फोन बंद कर दूँगा। कक्ष में प्रवेश करने के पहले फोन बंद करने ही वाला था कि फोन कि घंटी बज उठी। कुछ क्षणों का हेर-फेर होने पर फोन बंद होकर जेब में आ चुका होता। आज की भजन गायिका का फोन था, बता रही थी कि वह ट्राफिक में फंसी है अतः आने में देर होगी। आज यह फोन साथ में था और बंद भी नहीं था।  साधारणतया मैं यह भरी फोन साथ में नहीं रखता लेकिन आज संयोग ही कुछ ऐसा बैठा कि यही फोन साथ था। अगर वैसा संयोग नहीं होता तो फोन मेरे पास नहीं होता, बात नहीं हो पाती। खैर कक्ष में प्रवेश करते-करते विचार किया कि आज भजन और वार्ता का क्रम उल्टा कर दूँगा। आज की वार्ताकार से अनुरोध करूंगा कि गायिका को आने में कुछ विलंब होगा अतः वार्ता प्रारम्भ करें तब तक गायिका आ जाएगी।

          लेकिन कक्ष में प्रवेश किया तो पाया कि आज की वार्ताकार अनुपस्थित है। मतलब कि आज का पूरा मोर्चा मुझे ही संभालना पड़ेगा। सोचने लगा कि क्या बोलूँ?  तभी याद आया कि आज ही शाम को जो एक पन्ना पढ़ा हूँ उस पर बोला जा सकता है। और मैंने माईक संभाल लिया। मेरी वार्ता समाप्ति के नजदीक ही थी कि मैंने देखा कि आज की गायिका कक्ष में प्रवेश कर रही है। आज के इस दिन भर की परिचर्या में कई जोड़-तोड़ हुए लेकिन मुझे छोड़ और किसी को पता नहीं चला और सब कार्यक्रम सुचरू रूप से सम्पन्न हो गया।

          कितने तोड़ हुए और कितने जोड़? हर तोड़ पर उद्विग्न हुआ और हर जोड़ पर संतोष। सब जोड़-तोड़ ऐसे हुए कि किसी भी न तोड़ का भान हुआ न जोड़ की प्रतीति। कार्यक्रम बिना व्यवधान के सम्पन्न हो गया।

          कौन जोड़ता है – कौन तोड़ता है हम समझ नहीं पाते। जोड़ पर प्रसन्न और तोड़ पर हताश मत होइये। हम नहीं जानते कि रचनाकार क्या कर रहा है। जो भी है उसे स्वीकार कीजिये और उस रचयिता के अहसानमन्द बने रहिए, वह तोड़ को ठीक से जोड़ सकता है, कुछ जोड़ने के लिए ही तोड़ रहा है। 

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बुधवार, 1 नवंबर 2023

सूतांजली नवम्बर 2023


 

कथनी नहीं – करनी

(श्री माँ, पांडिचेरी)

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हम खुद ही विश्व हैं                                                हम बदलेंगे युग बदलेगा

जी हाँ, हम ही संसार हैं और अगर युग को बदलना चाहते हैं तो हमें खुद को बदलना होगा। अगर खुद को बदलते हैं तब दुनिया अपने-आप बदल जायेगी।

          केशव, विचारशील दिमाग और सहानुभूति पूर्ण हृदय वाला पश्चिम में पढ़ा-लिखा  एक उत्साही युवा साधक है। वह मानव समाज में हर जगह फैली हिंसा और पीड़ा का असली अर्थ, उद्देश्य और उनके निराकरण का उपाय जानना चाहता है। वह भारत की आध्यात्मिक विद्या और ज्ञान तथा इस ज्ञान के आधुनिक प्रणेता श्री जनार्दन महाराज से बहुत प्रभावित है। श्री जनार्दन आधुनिक भारत के एक संत हैं जिन्होंने एक साधारण व्यापारी के रूप में अपना व्यवसाय करते हुए भी ज्ञान-मार्ग का उच्चतम स्तर हासिल किया है। हालाँकि संत जनार्दन बाह्य रूप से प्रेम करने वाले और दयालु हैं, वे अपने व्यवहार और बातचीत में कभी उदासीन और कभी कठोर भी हैं। उन्होंने मानव के शारीरिक कष्ट, पीड़ा या मृत्यु के लिए कभी किसी प्रकार की भावुकता, दया या सहानुभूति का प्रदर्शन नहीं किया।

          केशव जब भी भारत आते थे, संत जनार्दन के दर्शन करते थे और उनसे लंबी चर्चा करते थे। संत केशव के लिए गहरा और विशेष स्नेह महसूस करते थे। आज पड़ोसी देशों में हो रही साम्प्रदायिक हिंसा और उत्पात से केशव बहुत निराश था। जब वह संत जनार्दन से मिले, तो उन्होंने  पूछा, “महाराज, क्या आपने अखबारों में उन्मत्त, विचारहीन, नासमझ और बेवकूफी से किये गए नर-संहार  के संबंध में पढ़ा है? इस संबंध में आपके क्या विचार हैं?”  संत ने उदासीनता से कहा, “मैं समाचार पत्र नहीं पढ़ता और मेरी कोई राय भी नहीं है। वे टिमटिमाती छवियों की तरह हैं जो एक पर्दे पर दिखाई देती हैं और फिर गायब हो जाती हैं।”

          “महाराज, आप निर्दयी हैं”,  केशव ने कहा। “लोग हजारों की संख्या में मर रहे हैं और आप आराम से बैठे हैं और छवियों के बारे में बात कर रहे हैं! क्या आपको उनके प्रति सहानुभूति नहीं है?”

          जनार्दन ने शान्त स्वर में उत्तर दिया, “तुम्हारी जैसी सहानुभूति मुझमें नहीं है। तुम्हारी सहानुभूति क्या कर सकती है? क्या तुम्हारे ये तुक्ष अहं की अज्ञानतापूर्ण भावनाएँ इस संहार को रोक सकती हैं?”

          केशव ने आवेश से कहा “गुरुदेव मैं भावनाओं और कर्म का आदमी हूं। जब लोग मर रहे हों, मैं आपकी तरह यहां बैठकर दर्शनशास्त्र की बात नहीं कर सकता। मैं कुछ करना चाहता हूं”।  संत ने कुछ क्षण के लिए केशव की ओर एक उदार मुस्कान के साथ देखा और कहा, “तुम क्या कर सकते हो? अगर, तुम्हें पीड़ित लोगों की मदद करने का मन करता है तो जाओ और मदद करो। लेकिन जाने से पहले अपने उत्तेजित मन और हृदय को शांत करो। कुछ देर इस बात पर विचार करो कि उनकी मदद करने का सबसे अच्छा तरीका क्या है? और उस मार्ग के बारे में बहुत स्पष्ट रहो।” एक पल की चुप्पी के बाद संत ने आगे कहा, “मैंने तुम्हें यह कई बार समझाया है कि जब तक लोगों के दिलों-दिमाग में हिंसा है तब तक बाहर की दुनिया में हिंसा रहेगी। तुम इसे रोक नहीं सकते क्योंकि तुम ही दुनिया हो।”

          “एक नियम और सिद्धांत के रूप में, हाँ, मैं आपसे सहमत हूँ, लेकिन उपाय क्या है?” केशव ने प्रश्न किया।

          “मैं इसे एक उदाहरण के साथ समझाता हूं”  संत ने कहा। “तुम एक थियेटर में हिंसा, पीड़ा, वध और कुरूपता से भरी फिल्म देख रहे हो। अगर तुम इसे किसी खूबसूरत चीज में बदलना चाहते हो तो तुम क्या करोगे? तुमको फिल्म के प्रोजेक्टर में सुंदरता और अच्छाई से भरी फिल्म से बदलना होगा। प्रोजेक्टर तुम्हारा अपना दिमाग है और फिल्म तुम्हारे विकास के दौरान जमा किए गए सभी विचारों, भावनाओं, आवेगों और कर्मों की छापों का संग्रह है। तुम जिस संसार को देखते और अनुभव करते हो, वह तुम्हारे अपने मन का प्रक्षेपण है, क्योंकि तुम ही संसार हो। अगर तुम दुनिया को बदलना चाहते हो तो तुम्हें प्रोजेक्टर में फिल्म बदलनी होगी। पर्दे पर मर रही और पीड़ित छवियों पर उत्तेजित होने का क्या फायदा? क्या यह छवियों की प्रकृति को बदल देगा?”

          प्रशंसात्मक मुस्कान के साथ, केशव ने कहा, “मुझे आपके रूपक पसंद हैं। वे मेरी समझ को परिपक्व बनाते हैं ... फिल्म को बदलना  ... जिसका अर्थ है ... परिवर्तन या चेतना का रूपांतर .. ... यह योग का यौगिक काल्पनिक आदर्श है। ठीक है, मैं सैद्धान्तिक रूप में सहमत हूं कि यह सभी मानवीय समस्याओं का अंतिम समाधान है। लेकिन यहां मुख्य समस्या यह है कि यह समाधान बहुत दूर का आदर्श है जो कई सहस्राब्दियों के बाद ही हो सकता है। तब तक, क्या हम बिना भावनाओं के पत्थरों की तरह बैठे रहें और मानव के कष्ट कम करने के लिए कुछ भी न करें?”

          “क्या मैंने ऐसा कहा?, संत ने पूछा, “यदि तुम भीतर से महसूस करते हो तो जाओ मदद करो। लेकिन इससे ज्यादा सहायता नहीं होगी, क्योंकि जब तक दुःख और पीड़ा के कारण अंदर रहेंगे वे बार-बार अलग-अलग अनेक रूपों में खुद को बाहरी रूप से व्यक्त करेंगे। लेकिन दूसरों की मदद करने में कुछ भी गलत नहीं है क्योंकि यह तुम्हें स्वयं के प्रति अपने आंतरिक विकास में मदद करता है। वास्तव में दूसरों की मदद करके तुम अपनी मदद कर रहे हो क्योंकि तुम ही दुनिया हो। महसूस करना और सहानुभूति प्रकट करना अच्छा है क्योंकि यह तुम्हारे दिल की पंखुड़ियों को प्यार करने के लिए खोलने में मदद करता है”।

          केशव ने कहा, “आप कह रहे हैं कि दूसरों की मदद करके मैं अपनी मदद कर रहा हूं! इस कथन में तो स्वार्थ की गंध है। आप तो बाहरी सहायता को इतने हल्के में ले रहे हैं और खारिज भी कर रहे हैं। अगर कुछ संस्थाएं बेरोजगारों के लिए कुछ स्थायी आजीविका खोजने में मदद करतीं, तो यह करुणा का एक बड़ा काम होता। आप इसे बेकार कहकर खारिज नहीं कर सकते क्योंकि यह इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।”

          “मैंने कभी नहीं कहा कि बाहरी मदद बेकार है”, संत जनार्दन ने जोर देकर कहा, “हर गतिविधि जो दुःख को कम करने में मदद करती है और लोगों की रहने की स्थिति में सुधार करती है सराहनीय है। उदाहरण के लिए शरीर में एक बीमारी का इलाज करने में, सबसे प्रभावी उपाय बीमारी के मनोवैज्ञानिक कारणों का पता लगाना है और उन्हें समाप्त करना है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आपको बाहरी दवाओं का उपयोग नहीं करना चाहिए, विशेष रूप से कम से कम दुष्प्रभाव वाले उपचारों से। वास्तव में, आंतरिक और बाहरी उपचार परस्पर विरोधी नहीं हैं, उनका एक साथ प्रयोग किया जा सकता है। लेकिन भारतीय आध्यात्मिक आदर्श आंतरिक उपचार में अधिक विश्वास रखता है जो एक सकारात्मक और स्थायी आंतरिक परिवर्तन की ओर ले जाता है।

          केशव ने विरोध किया, “नहीं, मैंने कहा कि मैं स्थायी दीर्घकालिक समाधान के रूप में आपके आदर्श से सहमत हूं। लेकिन, मैं भविष्य के आदर्श के बजाय वर्तमान के  कार्यों में अधिक विश्वास रखता हूं। क्या आप मुझे बता सकते हैं कि मैं आपके आध्यात्मिक आदर्श की ओर बढ़ने के लिए आंतरिक और बाह्य रूप से क्या कर सकता हूं?”

          संत ने कहा, “यह एक अच्छा प्रश्न है। बाह्य क्रिया के संबंध में, तुम जो कुछ भी गहराई से महसूस करते हो और अपनी प्रकृति, स्वभाव, मान्यता,  क्षमता के अनुसार कर सकते हो करो। तुमको लगातार याद रखना चाहिए कि तुम, बल्कि हम ही विश्व हैं। तुम और मैं और इस दुनिया में हर कोई, व्यक्तिगत रूप से और सामूहिक रूप से जो भी अंधकार, बुराई या पीड़ा देखते हैं उसके लिए जिम्मेदार हैं। यदि तुम दुनिया में हिंसा का अंधकार देखते हो, तो उस हिंसा का थोड़ा सा हिस्सा तुम्हारे स्वयं के भीतर है,  हो सकता है कि वह बाहरी क्रिया में न दिखता हो, लेकिन तुम्हारे अपने विचार, भावना, आवेगों, उद्देश्यों में हो। यदि तुम अपने भीतर के उस अंधेरे को खत्म कर सकते हो और इसे प्रकाश में बदल सकते हो, तो इसका समान प्रभाव बाहरी जीवन के अंधेरे पर पड़ता है।”

          “एक मिनट रुकिए”, केशव ने टोका, “क्या इसका मतलब यह है कि दुनिया के सभी चार अरब लोगों को वह करना होगा जो आप कह रहे हैं, यह एक बेतुका असंभव समाधान है?”

          “क्या यह एक बेतुका असंभव प्रश्न नहीं है?”, जनार्दन ने प्रतिप्रश्न किया, “मैं तुमसे बात कर रहा हूँ अरबों से नहीं। हर बड़ा परिवर्तन कुछ लोगों से शुरू होता है और धीरे-धीरे जनता में फैल जाता है। यहाँ भी तुम्हारे और मेरे जैसे कुछ लोगों को जीवन की गहरी सच्चाइयों के प्रति जागृत होना और उसका निरंतर अभ्यास करना पड़ता है।”

          कुछ लोग लाखों को कैसे प्रभावित कर सकते हैं?”, केशव सवाल किया।

          “कोई भी इंसान एक द्वीप की तरह अकेला नहीं है”, संत जनार्दन ने समझाया “हम सभी एक छिपी हुई एकता से जुड़े हुए हैं। हमारा जीवन परस्पर एक दूसरे पर आश्रित है और एक दूसरे से जुड़ी हुई एकता का हिस्सा है। एक व्यक्ति की आंतरिक उपलब्धि और परिवर्तन का अन्य व्यक्तिगत केंद्रों पर प्रभाव पड़ता है। इससे अन्य व्यक्तियों एवं केंद्रों में भी आंतरिक उपलब्धि और परिवर्तन की क्षमता उत्पन्न होने या बढ़ाने में सहायक होता है।”

          “लेकिन महाराज, यह कई सहस्राब्दियों से चल रहा है”,  केशव ने अपने प्रश्न के साथ आगे कहा, “मानव सभ्यता की शुरुआत के बाद से आप जैसे कई संत और साधक आप जो कह रहे हैं उसका अभ्यास कर रहे हैं, लेकिन फिर भी दुनिया अंधेरा में डूबी हुई है।”

          संत ने धैर्य के साथ उत्तर दिया, “क्योंकि, इन गहन सत्यों का अभ्यास करने वालों की संख्या अभी भी कम है और अभी तक एक क्रिटिकल मास* (महत्वपूर्ण संख्या) तक नहीं पहुंची है।

(*क्रिटिकल मास – इसे समझने के लिये कह सकते हैं कि यह वह महत्वपूर्ण या न्यूनतम संख्या है जिसके बाद परिवर्तन की गति स्वतः तेज हो जाती है।)

इस महत्वपूर्ण संख्या (क्रिटिकल मास) तक पहुंचने के लिए, तीन शर्तों को पूरा करना होगा।

१ला - गहरे और उच्च आदर्शों को शिक्षा का एक अभिन्न अंग बनाना,

२रा - एक सामूहिक वातावरण, मानसिक और सामाजिक, जो इन उच्च आदर्शों को ग्रहण करने के लिए तैयार हो, और  

३रा - विचार और कर्म में एक ऐसा आदर्श नेता जो जीवन का एक जीता-जागता उदाहरण बने और और सचेत रूप से जीवन के हर क्षेत्र में इन आदर्शों को बढ़ावा दे और क्रियान्वित करे।

अब तक इन तीनों स्थितियों को पूरी तरह प्राप्त नहीं किया गया है।

“आपको क्या लगता है कि ऐसा कब तक हो सकता है?”

“मैं सटीक समय नहीं बता सकता। लेकिन मुझे लगता है कि समय आ गया है और अब यह ज्यादा दूर नहीं है।”

लगभग कितनी दूर?”

शायद कुछ शताब्दियाँ।”

कुछ शताब्दियाँ! यह कोई छोटी अवधि नहीं है”!

“यह तुम्हारे छोटे से दिमाग को लंबा समय लग सकता है। लेकिन प्रकृति के अरबों चक्रों में कुछ क्षणिक शताब्दियां कितना लंबा समय है?

तब, हमें अभी कुछ और सदियों तक भुगतना होगा!”

जिस दिन से हम वानर से मनुष्य के रूप में उभरे हैं, हम कई सहस्राब्दियों से पीड़ित हैं। तब कुछ और शताब्दियों के लिए क्यों नहीं...? यदि हम इस अवधि के दौरान, सिखाई गई सच्चाइयों के प्रति अधिक से अधिक ग्रहणशील हो सकते हैं, तो हम पीड़ा से मुक्त और शाश्वत शांति और आनंद से बनी जिंदगी जी सकते हैं।”

“अगर हम ऐसा कर सकते हैं... लेकिन अगर हम ऐसा नहीं कर सके ...”

जनार्दन ने टोकते हुए सख्ती से तेज आवाज में कहा, “रुक जाओ, हम इसके बारे में बात नहीं करते हैं, नकारात्मक सोच मानव प्रगति के लिए सहायक नहीं हैं। मेरे अकेले के करने से क्या होगा जैसी नकारात्मक सोच का त्याग करना होगा। यह सोचना और कल्पना करना बेहतर है कि अगर मानव जाति इसके लिए सहमत है तो हमारा भविष्य शानदार और भव्य होगा।”

“लेकिन, मुझे सपने देखने में कोई दिलचस्पी नहीं है।”

“क्या हमारे सर्वोत्तम सपने की प्रगतिशील प्राप्ति मानव की प्रगति नहीं है?”, संत जनार्दन ने पूछा। इस तरह का एक आशावादी सपना उन चमकदार भविष्य की संभावनाओं को प्रकट करने के लिए एक आह्वान और प्रार्थना की तरह काम करता है। एक महान रहस्यवादी और कवि के शब्दों में :  

“हमारे स्वप्न,

पंख वाले सत्य के घोड़े हैं,

सत्य के उन घोड़ों में

स्वर्ग को पृथ्वी पर लाने

की शक्ति है।”

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सिद्धि का लक्ष्य                                         छोटी कहानियाँ जो सिखाती हैं जीना

१९वीं शताब्दी के भारतीय सन्तों, सुधारकों और चिन्तकों में 'बादशाह राम' के नाम से प्रतिष्ठित संत थे। देशाटन करते हुए एक बार वे ऋषिकेश पहुँचे। उन दिनों मुनि की रेती से स्वर्गाश्रम आने-जाने के लिए नौकाओं की व्यवस्था थी। उन नौकाओं के मल्लाह उन दिनों गंगा पार करने का एक ओर की उतरायी का एक पैसा वसूल करते थे।  मुनि की रेती पर गंगा के किनारे स्वामी बादशाह राम नौका की प्रतीक्षा कर रहे थे कि एक तथाकथित पहुँचे हुए साधु उनके पास आये और बोले-“बादशाह राम! हमने तो सुना था कि तुम बड़े सिद्ध हो गये हो। तुम क्या अपनी सिद्धि के बल पर गंगा भी पार नहीं कर सकते? मुझे तो कोई जानता तक नहीं। परन्तु मुझे तो इतनी सिद्धि मिल गयी है कि में गंगा लाँघ सकता हूँ।"

          बादशाह राम मुस्कुरा उठे! बोले- "महाराज, यह जान कर बड़ी प्रसन्नता हुई। क्या आप बतायेंगे कि इतनी सिद्धि प्राप्त करने के लिए आपने कितने वर्षों तक निरन्तर साधना की है?" उन सिद्ध साधु ने तुरन्त उत्तर दिया- "लगातार तीस वर्षों की साधना के बाद मुझे यह सिद्धि मिली है। कहो तो गंगा को लाँघ कर दिखा दूँ।" स्वामी बादशाह राम पुनः मुस्कुराये; बोले- "तुम्हारी तीस वर्षों की साधना का इतना छोटा-सा फल मिला? तुमने गंगा पार करने का एक पैसा जाने का और एक पैसा लौटने का, कुल दो पैसे बचाये। यही साधना तुम किसी ऊंचे लक्ष्य की प्राप्ति के लिए करते तो कहीं कम समय में तुम्हें कहीं बड़ी उपलब्धि हो जाती।"

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रविवार, 1 अक्टूबर 2023

सूतांजली अक्तूबर 2023



खुद को अच्छा बना लीजिये
,

दुनिया से एक बुरा आदमी

कम हो जायेगा

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अर्चना और याचना

 आपने अपने परिवार के बड़े-बुजुर्गों को देखा होगा कि वे किसी भी मंदिर में दर्शन के बाद बाहर सीढ़ी पर, चौकी पर या आँगन में थोड़ी देर बैठते थे या बैठने के लिए कहते थे! क्यों?

          आजकल तो लोग मंदिर की पैड़ी (सीढ़ी) पर-आँगन में बैठकर अपने घर की, व्यापार की, राजनीति की चर्चा करते हैं। परंतु यह प्राचीन परंपरा एक विशेष उद्देश्य के लिए बनाई गई। वास्तव में मंदिर की सीढ़ी पर बैठ कर के हमें एक श्लोक बोलना चाहिए। यह श्लोक है :

अनायासेन मरणम, बिना देन्थेन जीवनम् ।

देहान्त तब सानिध्यम्, देहि मे परमेश्वरम्।।

यानी, “बिना तकलीफ के हमारी मृत्यु हो और हम कभी भी बीमार होकर बिस्तर पर पड़े-पड़े मृत्यु को प्राप्त न हों, चलते-फिरते ही हमारे प्राण निकलें। जब भी मृत्यु हो तब भगवान के सम्मुख हो, उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले। हे परम, परमेश्वर ऐसा वरदान हमें देना।”

परवशता का जीवन, यानी हमें कभी किसी के सहारे न रहना पड़े। जैसे कि लकवा हो जाने पर व्यक्ति दूसरे पर आश्रित हो जाता है, वैसे परवश या बेबस ना हों, ठाकुर जी की कृपा से बिना भीख के ही जीवन बसर हो सके, दूसरे की सहायता न लेनी पड़े। जैसे भीष्म पितामह की मृत्यु के समय स्वयं ठाकुर जी उनके सम्मुख आकर खड़े हो गए, वैसे ही उनके दर्शन करते हुए प्राण निकले।

          सबसे बड़ा दुःख परवशता है, और इसकी कामना करनी पड़ती है, ठाकुर से इसके लिए गुहार करनी पड़ती है। संपत्ति, संतान, जीवन साथी, धन, ऐश्वर्य आदि मांगने की जरूरत नहीं है। ये तो सांसारिक लोगों से भी प्राप्त हो सकते हैं। लेकिन  जन्म और मृत्यु ही ऐसे हैं जिन पर हमारा कोई वश नहीं है। कब, कहाँ, कैसे  हमारा जन्म होगा, कोई नहीं जानता। वैसे ही कब, कहाँ और कैसे हमारी मृत्यु होगी कोई नहीं जानता। यह तो भगवान हमारी पात्रता के हिसाब से खुद हमको देते हैं। इसलिये  दर्शन करने के बाद बैठकर यही प्रार्थना करनी चाहिए। यह प्रार्थना है, याचना नहीं है। याचना सांसारिक पदार्थों के लिए होती है। घर, व्यापार, नौकरी, पुत्र, पुत्री, सांसारिक सुख, धन या अन्य बातों के लिए जो मांग की जाती है, वह याचना होती है। इनकी याचना हम ईश्वर के अलावा सांसारिक लोगों से भी करते हैं।

          हम प्रार्थना करते हैं, प्रार्थना का विशेष अर्थ होता है, अर्थात विशिष्ट, श्रेष्ठ, उनके अलावा और कोई हमें यह प्रदान नहीं कर सकता। । अर्चना अर्थात निवेदन।  ठाकुर जी से प्रार्थना करें और प्रार्थना क्या करना है, इस श्लोक का पाठ करना है।

          जब हम मंदिर में दर्शन करने जाते हैं तो खुली आंखों से भगवान को देखना चाहिए, निहारना चाहिए। उनके दर्शन करने चाहिये। आंखें बंद क्यों करना? हम तो दर्शन करने आए हैं। भगवान के स्वरूप का, श्री चरणों का, मुखारविंद का, श्रृंगार का संपूर्णानंद लें। आंखों में भर ले स्वरूप को, दर्शन करें और दर्शन के बाद जब बाहर आकर बैठे तब नेत्र बंद करके जो दर्शन किए हैं उस स्वरूप का ध्यान करें। और अगर ठाकुर जी का स्वरूप ध्यान में नहीं आए तो दोबारा मंदिर में जाएं और भगवान का दर्शन करें और उनके स्वरूप को हृदयंगम कर लें।  नेत्रों को बंद करने के पश्चात, उनका ध्यान करके उपरोक्त श्लोक का पाठ करें।

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गाँधी और गीता                                                 गांधी जयंती पर विशेष

गाँधी के 150वें जन्म वर्ष में मैंने अपने शहर के अनेक विद्यालयों में “कौन जानता गाँधी को?  शीर्षक से प्रश्नोत्तरी (क्विज) का आयोजन किया था। इस दौरान गाँधी को जानने-समझने वाले कई विद्वानों तथा गाँधी संस्थाओं से परिचय हुआ। गाँधी पर बहुत पढ़ना भी पड़ा, इस कारण गाँधी को भी जानने-समझने का अवसर मिला। इसका एक प्रभाव यह भी हुआ कि बहुत से लोग यह मनाने लगे कि मैं “गांधीवादी” हूँ। अब क्या कहूँ? “गाँधीवाद” जैसा न कोई वाद है और न संप्रदाय। गाँधी  ने खुद यह घोषणा की थी कि मेरे नाम से न कोई वाद है और न होगा। मेरी अपनी कोई बात नहीं है, मैं जो कुछ भी कहता हूँ, लिखता हूँ, वह दुनिया के हर कोने के धर्मगुरु, धर्मग्रंथ, विद्वान, चिंतक, लेखक, नेता  की ही बातें हैं, मेरी अपनी नहीं। अब तब फिर कहाँ से यह “गाँधीवाद” पैदा हो गया? लेकिन हाँ, यह सही है कि मैं गाँधी को मानता, उनके प्रति मेरी श्रद्धा है।

          इस कारण जब भी, किसी को भी, गाँधी के विरोध में, उनके पास जितनी भी और जैसी भी जानकारी होती है, सोशल मीडिया में मिलती है, मेसेज में आता है सब मुझे भेज देते हैं, मुझे बताते हैं और उसकी मुझसे चर्चा करते हैं। मैं उसका जवाब नहीं देता। मेरा मौन उन्हें बेचैन कर देता है। वे पूछते हैं, “तुम कुछ कह नहीं रहे हो, तो क्या तुम मानते हो यह सही है?”

“क्यों आपको क्या लगता है, मैं आपकी बात स्वीकार कर रहा हूँ?,” मैं प्रतिप्रश्न करता हूँ।

वे कहते हैं, “नहीं मुझे तो ऐसा नहीं लगता।

“मैं अगर कोई जवाब दूँ तो क्या आप मेरी बात मान लेंगे?, अब मैं प्रश्न करता हूँ।

“....”। उनसे न हाँ कहते बनता है न ना।

मुझे पता है कि वे मुझसे न जानना चाहते हैं न समझना। वे विचार विमर्श नहीं करना चाहते, न ही ज्ञान चर्चा, उनका उद्देश्य केवल या तो मुझे क्षुब्द करना है या मेरे विचारों को बदलना और अपनी बात को मनवाना।

अतः मैं कहता हूँ, “अब अगर हम जानते हैं कि इस मुद्दे पर हम एक दूसरे से सहमत नहीं होंगे तो क्यों इस पर बहस कर आपसी सम्बन्धों में कटुता पैदा करें? लेकिन अब तुमने विषय छेड़ दिया है तो यह जरूर कहूँगा कि अगर तुम्हारे लिए संभव हो तो व्हाट्सएप्प और सोशल मीडिया को छोड़ कर भी गाँधी को पढ़ो, जानो, समझो फिर बात करेंगे।” मेरे इस सुझाव से वे सहमत तो नहीं होते। उनके पास न पढ़ने का समय होता है न ही धैर्य, वे तो बस चलते-फिरते व्हाट्स एप को ही वैश्विक ज्ञान की खान मानते हैं। लेकिन बेबुनियाद बहस समाप्त हो जाती है।

दूसरों की कही बातों को सही न मानकर हमें खुद ही इसका विश्लेषण करना होगा, समझना होगा, गहराई तक जाना होगा तब ही गांधी को समझ पाएंगे। अभी कल की ही बात है, मैं अपने एक जीवन के मार्गदर्शक के पास बैठा था। मैं उनका आदर भी करता हूँ, और उनकी बातों को गंभीरता से भी लेता हूँ। मुझे यह भी पता है कि वे गाँधी के विरोधी नहीं हैं लेकिन उन्हें स्वीकार भी नहीं करते। उन्होंने बताया कि वे गीता के बारे में जानते हैं लेकिन कभी उसे पढ़ा नहीं  है। (दुर्भाग्य से ऐसे अनेक लोग मिलेंगे जिन्होंने गीता न पढ़ी, न समझी, न सुनी लेकिन पंडितों की तरह गीता पर बहस करेंगे।) लेकिन उनकी सुपुत्री, जो अमेरिका में डॉक्टर है, गीता पढ़ रही है और उससे बहुत प्रभावित है। उसने अपने पति को गीता का भाष्य दिया है और वे उसे पढ़ रहे हैं। उन्हें अच्छा लग रहा है। उससे प्रभावित हैं। मेरे लिए यह एक सुखद और आश्चर्यजनक खबर थी, क्योंकि वे अपने विचारों के बड़े कट्टर हैं। फिर उन्होंने कहा-

          “गाँधी ने कहा है कि साधन का भी उतना ही महत्व है जितना साध्य का। अगर साधन सही न हो तो साध्य कहीं-न-कहीं जाकर दूषित हो जाता है। लेकिन गीता के दूसरे अध्याय में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि साध्य हासिल करने के लिए साधन की चिंता न कर, उठो खड़े हो जाओ, इन शत्रुओं का संहार करो। इस प्रकार वे साध्य को ही महत्व दे रहे हैं, साधन को नहीं।” 

          मेरे लिए बड़ी विषम परिस्थिति हो गई।  यह बात तो समझ आ गई थी कि वे गीता अभी पढ़ना शुरू किए हैं और तो और दूसरे अध्याय तक ही पहुंचे हैं। गीता और उसके संदर्भ में गांधी पर टिप्पणी कर रहे हैं जिन्होंने  जीवन भर गीता पढ़ी, गुनी और साधी। बहस करना भी उचित नहीं लगा और न ही मौन रहना। मैंने संक्षेप में इतना ही कहा कि गाँधी और गीता जिस ऊंचाई पर हैं, गाँधी की जितनी साधना है, गाँधी का जितना अनुभव है उसकी तुलना में मैं कहीं नहीं हूँ, गीता जितनी सरल है उतनी ही कठिन भी, अपनी जिंदगी में मैं उसे पूरा समझ ही नहीं पाऊँगा, अतः उस पर भी किसी प्रकार की टिप्पणी करने  का दुःसाहस मैं नहीं कर सकता। सौभाग्य से उन्होंने भी बात को घुमा दिया।

          बात को सुलझते हुए देख मैंने भी दो प्रसंग और जोड़ दिये। मशीन के बहिष्कार को लेकर विश्व के अनेक लोग गाँधी से नाराज, मर्माहित और दुःखी थे। प्रसिद्ध फिल्म अभिनेता और निर्माता चार्ली चैपलीन, जो गाँधी के बड़े हिमायती थे, वे भी बड़े दुःखी हुए। मौका मिलते ही वे गाँधी से मिले और मशीन के बहिष्कार के मुद्दे पर उनसे चर्चा की। एक लम्बी चर्चा के बाद वे वहाँ से पूर्ण तरह गांधी के विचारों से सहमत हो कर निकले और उसके बाद अपनी प्रसिद्ध फिल्म द डिक्टेटर का निर्माण किया। अतः अब आज, जब गाँधी नहीं है तब उनके दृष्टिकोण की व्याख्या कौन करेगा? हम अगर उतनी ऊंचाई पर पहुंचे तथा उनकी जैसी दूरबीनी-दृष्टिकोण हो तभी समझ सकते हैं। अन्यथा उस पर टिप्पणी न कर अपनी अज्ञानता कबूल करना ही उचित है।

         गाँधी ने एक और बात कही थी। 100 में से 99 रास्ते अहिंसा के हैं एक आखिरी रास्ता हिंसा का है... लेकिन वो आखिरी है... और दुनिया के 99 मसले पहले 99 रास्तों से हल हो सकते हैं... कुरुक्षेत्र में युद्ध का शंख फूंकने के पहले श्रीकृष्ण ने अहिंसा से सुलह कराने के अनेक प्रयत्न किए। लेकिन हर प्रयत्न के असफल हो जाने के बाद ही युद्ध का निर्णय लिया गया। और जब यह निर्णय ले लिया गया, शंख फूँक दिये गए, उसके बाद पीछे हटना कायरता ही है। राम ने भी,  युद्ध का डंका फूंकने के पहले बिना युद्ध के मार्ग खोजने का प्रयत्न किया। लेकिन मार्ग न मिलने पर ही हिंसा का मार्ग अपनाया। गाँधी ने भी बार-बार यही कहा है कि अहिंसा कायरों का नहीं बहादुरों का हथियार है।

          गीता भी, जैसे-जैसे हम एक-के-बाद-एक अध्याय के पन्ने पलटते हैं, कई बार भ्रम पैदा करती है कि श्रीकृष्ण तो विरोधी बात कह रहे हैं। लेकिन विश्लेषण करने पर समझ आती है कि नहीं वे विरोधी बातें नहीं कर रहे हैं बल्कि दोनों मार्ग बता कर उनके दोष-गुण की चर्चा कर रहे हैं, सुगम और दुर्गम मार्ग की चर्चा कर रहे हैं। हर इंसान, दूसरे इंसान से अलग है। हर किसी को अपनी प्रकृति और प्रवृत्ति के अनुसार मार्ग का चयन करना चाहिए।  वह खुद अपना मित्र भी है और खुद ही अपना दुश्मन भी। गुरु मार्ग दिखा सकता है लेकिन चलना तो उसे खुद ही पड़ेगा।

          कैसी भी टिप्पणी करने के पहले खुद अपना विश्लेषण करना चाहिए। बिना समुचित अध्ययन और स्वाध्याय के टिप्पणी करना शोभा नहीं देता है।

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भाव और दृढ़ विश्वास                                     संस्मरण जो सिखाती है जीना

रामदासजी जब प्रार्थना करते थे तो कभी उनके होठ नहीं हिलते थे।

शिष्यों ने पूछा- हम प्रार्थना करते हैं तो होंठ हिलते हैं, आपके होंठ नहीं हिलते! आप पत्थर की मूर्ति की तरह खड़े हो जाते हैं। आप कहते क्या हैं अन्दर से? क्योंकि अगर आप अन्दर से भी कुछ कहेंगे तो होठों पर थोड़ा कंपन आ ही जाता है। चेहरे पर बोलने का भाव आ जाता है। लेकिन आपके चेहरे पर वह भाव भी नहीं आता

यह सुनकर सन्त रामदास जी ने कहा –

मैं एक बार राजधानी से गुजराराजमहल के सामने द्वार पर मैंने सम्राट को खड़े देखा और वहाँ एक भिखारी को भी देखा। वह भिखारी बस खड़ा था। फटे कपड़े थे उसके शरीर पर। जीर्ण-जर्जर देह थी, जैसे बहुत दिनों से भोजन न मिला हो, शरीर सूख कर कांटा हो गया। बस आँखें ही दीयों की तरह जगमगा रही थीं। बाकी जीवन जैसे सब तरफ से विलीन हो गया हो। वह कैसे खड़ा था यह भी आश्चर्य था? लगता था अब गिरा-तब गिरा ! सम्राट उससे बोले – बोलो क्या चाहते हो?

उस भिखारी ने कहा अगर आपके द्वार पर खड़े होने से मेरी मांग का पता नहीं चलता, तो कहने की कोई जरूरत नहीं। क्या कहना है? और मैं द्वार पर खड़ा हूँ, मुझे देख लो, मेरा होना ही मेरी प्रार्थना है।"

सन्त रामदास जी ने कहा - उसी दिन से मैंने प्रार्थना बंद कर दी। मैं परमात्मा के द्वार पर खड़ा हूँ।  वह देख लेंगे। मैं क्या कहूँ?

अगर मेरी स्थिति कुछ नहीं कह सकती, तो मेरे शब्द क्या कह सकेंगे अगर वह मेरी स्थिति नहीं समझ सकते तो मेरे शब्दों को क्या समझेंगे?

अतः भाव व दृड विश्वास ही सच्ची परमात्मा की याद के लक्षण है। यहाँ कुछ मांगना शेष नहीं रहता। आपका प्रार्थना में होना ही पर्याप्त है।

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