सोमवार, 1 नवंबर 2021

सूतांजली नवंबर 2021

 सूतांजली

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वर्ष : ०५ * अंक : ०४                       🔊(26.30)                                           नवंबर   * २०२१

भरी दुपहरी में अँधियारा, सूरज परछाईं से हारा,

अन्तरतम का नेह निचोड़ें, बुझी हुई बाती सुलगाएँ

आओ फिर से दिया जलाएँ ।

अटल बिहारी वाजपेयी

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लक्ष्मी-संदेश                                                                   मैंने पढ़ा

(दीपावली के पर्व पर, चालीस दशक पहले रिंकी भट्टाचार्य ने लक्ष्मीजी का यह संदेश नारद के हाथों हम तक पहुँचाया था। हम, उस समय भी थे आज भी हैं। शायद उस समय भी हमने यही कहा होगा क्या करें जमाना ही ऐसा है, हम मबूर हैं। तब से आज के जमाने में सुधार हुआ या खराब हुआ है? इसके लिए किसी भी प्रकार के आँकड़े की  दरकार नहीं है। हम जानते हैं। और, क्या आप को मालूम है यह जमाना कौन है? क्या ये हम ही नहीं हैं? हम कहते हैं क्या करें मजबूर हैं! इससे भी मजेदार बात यह है कि हम मजबूरी में जमाने के अनुसार चल रहे हैं तो मजबूत हैं और जिन्होंने मजबूती के साथ जमाने को बदला उसे मजबूर की संज्ञा दे दी!)

...बसंत से भी लुभावनी ऋतु, चाँदनी दिग-दिगन्त में फैली हुई, नारायण और लक्ष्मी अपने सिंहासनों पर विराजमान। नारायण बोले लक्ष्मी से – हे त्रिभुवन की रक्षा करने वाली, रिद्धी-सिद्धि देनेवाली, तुम मर्त्यलोक के प्राणियों के कष्ट का निवारण कब करोगी।  

लक्ष्मी ने सिर नवाकर ध्यान से स्वामी की बात सुनी और बोली, हे नाथ, मर्त्यलोक के नर-नारी अपने लोभ और मत्सर के कारण कष्ट उठा रहे हैं। वे इतने पतित हो गये हैं, भ्रष्टाचार में लिप्त हो गये  हैं, वासनाओं में  अंधे हैं, बंधुजनों की हत्या में लीन हैं, और घृणा फैलाने में व्यस्त हैं कि अब वे इसी बात के योग्य हैं कि भाँति-भाँति के कष्ट भोगें। अब तो धरती का वातावरण इतना कलुषित हो गया है कि देवगण वहाँ जाना ही नहीं चाहते।  

लक्ष्मी जी के ये कठोर वचन सुनकर नारायण उदास हो गये। उन्होंने पूछा, हे देवी, फिर मर्त्यलोक के प्राणियों के उद्धार का उपाय क्या है? वे क्या करें कि उनके घर में लक्ष्मी का निवास हो?’ यह मर्म वार्ता चल ही रही थी कि लो, नारद भी वीणा टंकारते हुए आ पहुँचे। वे सीधे धरती से आ रहे थे और बिलकुल ताजे आँखों देखे समाचार वहाँ से लाये थे। उन्होंने भी बताया कि धरती कष्टों के बोझ से लदी हुई है। एक कण भी ऐसा नहीं  है जहाँ पावनता हो, आनंद हो।  



लक्ष्मीजी पुन: बोलीं, हे मुनिश्रेष्ट उन्हें जानना चाहिये, विचार करना चाहिये कि वे यह कष्ट क्यों भोग रहे हैं। देवताओं ने मनुष्यों पर कृपा करनी क्यों छोड़ दी? क्यों वे धरती का ध्यान भुला बैठे हैं? इसका कारण यह है कि मनुष्यों में भौतिक समृद्धि की लालसा अतिरेक पर पहुँच गई है। न उनमें बंधुत्व की भावना रह गई है, न अपने से बड़ों के प्रति आदर, न मनुष्य मात्र के लिये करुणा। केवल अपनी लालसाओं का अन्धा दास बन कर रह गया है मनुष्य। फिर भी...”, लक्ष्मी जी असीम करुणा से द्रवित हो कर बोलीं, मैं समस्त पापाचार और प्राणियों के दु:ख का नाश करने पुन: पृथ्वी पर अवतरित  होऊँगी।  

कुछ क्षण विचारों में डूबी रहीं, फिर बोली, सुनो हे ब्रह्मसुत, मेरा संदेश सुनो। विशेषत: पृथ्वी पर नारी-जाति के लिये है यह मेरा संदेश। क्योंकि नारी ही पुरुष जाति की जननी है। स्त्री को यह समझ लेना चाहिये कि वह केवल भोग्या नहीं है। वह समस्त धर्मों का, आचारों का आश्रय है, मनुष्य मात्र के जीवन और संस्कृति की संरक्षिका है। नारी को ब्रह्म मुहूर्त में ही जाग जाना चाहिये। सब तरफ आस-पास उसे स्वच्छता रखनी चाहिये। स्वच्छता होगी तभी तो देवगण पधारेंगे। मैं मनुष्य जाति का कल्याण स्त्री-जाति के माध्यम से ही करती हूँ। अगर स्त्री की बुद्धि भटक जाये, वह स्वार्थी हो जाये, समाज और कुल की मर्यादा का पालन न करे, तो फिर मैं भी कुछ नहीं कर सकती। अगर वह परिवार की देख-भाल भली-भांति करे, तो मैं उसे आनंद और धन-धान्य से भर देती हूँ।  

“जिस घर में गंदगी हो, शोर हो, व्यर्थ की वितंडा हो, उस घर में मैं कभी नहीं जाती। जहाँ लोग मीठी वाणी बोलते हों, जहाँ जीवन पद्धति सुन्दरता से सनी हो, जहाँ शांति छायी हो, वहाँ मैं निवास करती हूँधरा को मेरा वरदान स्त्रियों के माध्यम से ही मिलता है। न मैं जाति देखती हूँ, न संप्रदाय। क्रोध, अहंकार और लोभ तो मुझे जरा भी नहीं भाते। मैं तो उसकी चेरी हूँ, जिसमें नम्रता है, करुणा है, मातृभाव है, संकल्प है, और मर्यादा पालन है।  

हे ब्रह्मसुत, तुमने मेरा संदेश सुना। अब तुम त्वरित गति से भूलोक पधारो और जो मैंने कहा है उसे भूलोक के प्राणियों तक पहुँचा दो, ताकि वे उन कष्टों से मुक्ति पा सकें, जो स्वयं उन्होंने अपने लिये उत्पन्न कर लिये हैं। और मेरी आज्ञा का पालन कर सुख, संतोष और शांति लाभ कर सकें। जो मेरे संदेश को सुनेंगे और समझेंगे, उनका पालन करेंगे, मैं सदा उनके साथ रहूँगी

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शुभ-लाभ और भाषा                                                                मैंने पढ़ा

(काशीनाथ जोशी के कलम से)

शुभ और लाभ ये दो ऐसे शब्द हैं जो हर व्यापारी की गद्दी पर आपको लिखे मिलेंगे। छोटा-बड़ा हर व्यापारी इन दो शब्दों को अपनी गद्दी के पास बड़ी श्रद्धा से लिखवाता है, मानो ये दो शब्द साक्षात गणेश और लक्ष्मी हों। शुभ-लाभ में से शुभ का अर्थ बहुत व्यापक है। शुभ का संबंध उसके व्यापार की वस्तुओं, ग्राहक-समाज दोनों से है। इन दोनों का शुभ सोचते हुए अपने अल्प लाभ या समुचित लाभ की दृष्टि से व्यापार करना ही शुभ-लाभ का व्यापार करना है। शायद यह कहा जायेगा कि आज के जमाने में यह असंभव है। किन्तु क्या सचमुच स्थिति यही है? क्या समाज के शुभ को ध्यान में रख कर व्यापारी वर्ग कार्य कर ही नहीं सकता? इन प्रश्नों पर गहराई से सोचें।

 


एक उदाहरण आजादी की लड़ाई का है। जब उसका नेतृत्व एक बनिये के हाथ में आया, तो शायद उसने शुभ-लाभ की दृष्टि से उस पर सोचा और आंदोलन को आगे बढ़ा कर हमें आजादी का शुभ-लाभ कराया, जादी हासिल की। आजादी की लड़ाई में  हमें जो कुछ प्राप्त करना था, उसमें से आज भी बहुत-कुछ प्राप्त करना शेष है। ऐसी ही एक प्रमुख बात है भाषाई आजादी की। आज भी देश में  विदेशी भाषा अँग्रेजी का प्रभुत्व है इसके लिए बहुत हद तक भारतीय भाषाओं के साथ व्यापारी वर्ग का असहयोग ही जिम्मेदार है। भारत का व्यापारी, भाषाई स्वतन्त्रता की लड़ाई में हिस्सा नहीं ले रहा है।   

यह विचित्र सी बात है; क्योंकि आजादी की लड़ाई के जमाने में भारतीय व्यापारी अपनी भाषा के प्रति आस्थावान था। अँग्रेजी का मोह तब उसे नहीं होता था। दुकान के पटल से ले कर हिसाब लिखने तक हर काम, उसका अपनी भाषा के प्रति सहज आग्रह था। किन्तु अंग्रेजों के जाने के बाद उसे अँग्रेजी से मोह हो गया। उद्योग-व्यापार में अँग्रेजी का प्रचलन बढ़ता गया और भारतीय भाषाएँ पिछड़ती गईं। यह शुभ नहीं है। एक स्वतंत्र देश का व्यापारी अपने ही देश की भाषाएँ छोड़ दे, यह तो अशुभ है।  

यह सहज-सिद्ध बात है कि जो उसके ग्राहकों की भाषा है उसी में काम करना और अपने काम का प्रचार करना व्यापारी के लिये लाभकारी है। शुभ तो यह है ही। फिर हम उल्टा क्यों सोच रहे हैं? क्यों अँग्रेजी की ओर बढ़ रहे हैं? इससे अतिरिक्त लाभ कितना हो रहा है? इन प्रश्नों पर व्यापारी सोचें। वे इसका हिसाब भी लगायें कि अगर दुकान का पटल अँग्रेजी में है तो कितना लाभ हो रहा है और अगर यही पटल हिन्दी में हो तो क्या लाभ में कमी होगी 

उत्तर भारत में ही नहीं अन्य प्रदेशों में भी आधे से अधिक व्यापारियों के पटल या तो हिन्दी में हैं या प्रादेशिक भाषा में। तो क्या भारत का आधा व्यापारी समाज घाटे का व्यापार कर रहा है? निश्चित ही आप कहेंगे, नहीं। वे भी निश्चित ही लाभ कमा रह हैं – शुभ करते हुए लाभ। क्या भारत का बाकी आधा भटका हुआ व्यापारी वर्ग इससे कोई सबक नहीं लेगा 

आइए, इस प्रश्न से जुड़ी हुई दूसरी बात भी सोचें। कहावत हैं यथा राजा तथा प्रजा। इस देश पर जब अंग्रेजों का शासन था, तब दिल्ली का ही नहीं, लखनऊ, पटना, बंबई, कलकत्ता का सारा राजकाज अँग्रेजी में ही चलता था, तो उसे बहुत गलत नहीं कहा जा सकता था। पर आज तो ऐसा नहीं है। केंद्रीय सरकार का बहुत कामकाज अब हिन्दी में होने लगा है। हिन्दी भाषी प्रदेशों में अधिकांश राजकाज हिन्दी में होने लगा है। अनेक अहिंदी राज्य अपनी प्रादेशिक भाषाओं में काम करने लगे हैं। वे भाषाएँ निश्चय ही अँग्रेजी के बजाय हिन्दी के ज्यादा निकट हैं। पर हमारा व्यापारी इस परिवर्तन को देख ही नहीं रहा है। मजेदार बात यह है कि जब हमारा व्यापारी समाज अँग्रेजी की ओर बढ़ रहा है, तब विदेशी कंपनियाँ हिन्दी की ओर बढ़ रही हैं। आज बाजार में ढेरों ऐसे उत्पादन गिनाये जा सकते हैं, जो विदेशी कम्पनियों के हैं: पर जिनके आवरण पर एक तरफ अँग्रेजी है, तो दूसरी तरफ उतनी ही शान से हिन्दी में भी है। ये विदेशी कंपनियाँ व्यापार का गुर जानती हैं। जिन्हें लाभ कमाना है, वे ग्राहक की भाषा को अवश्य महत्व देते हैं। वे यह भी देखते हैं कि हवा किस ओर बह रही है।  

मैंने अपने नगर ग्वालियर के अँग्रेजी पटलों पर सर्वेक्षण किया, तो पाया कि जहाँ भारतीय स्टेट बैंक जैसे आसमान को छूने वाले बड़े प्रतिष्ठान के सब पटल हिन्दी के हैं, वहीं बाल काटनेवालों और दर्जियों के पटल अँग्रेजी के हैं। शायद अपने को छोटा महसूस करने वाले व्यापारी अँग्रेजी का पटल लगा कर बड़ा बनना चाहते हैं। कितनी हस्यास्पद स्थिति है यह 

जो व्यापारी अपने माल को अधिकाधिक ग्राहकों के पास ले जाना चाहता है, जो अपने माल के प्रति ग्राहक को आकृष्ट करना चाहता है, जो ईमानदारी से अपने माल के गुणों को ग्राहक को बतलाना चाहता है - उसके लिये यह आवश्यक है कि वह हिन्दी तथा प्रादेशिक भाषाओं का व्यवहार करे।... व्यापार और व्यापारी का शुभ-लाभ भारतीय भाषाओं के साथ जुड़ा हुआ है। इस बात को हमारे व्यापारी जितना शीघ्र समझें, उतना ही अच्छा होगा।

(प्राय: भारतीय भाषा का समर्थन, विदेशी भाषा का विरोध समझा जाता है और इसे उसी प्रकार प्रसारित भी किया जाता है। यह सत्य से दूर है। अपनी भाषा का समर्थन कभी भी विदेशी भाषा का विरोध नहीं हो सकता। मैं अपनी  माँ का आदर करता हूँ का यह तात्पर्य नहीं है कि मैं दूसरे की माँ आदर नहीं करता। अवश्यकतानुसार विदेशी भाषा का ज्ञान अर्जित करें और प्रयोग भी, लेकिन देश की कुछ प्रतिशत आबादी के लिए पूरे देश को अपनी भाषा छोड़ कर विदेशी भाषा सीखने-सिखाने की पहल दोषपूर्ण है।)

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शक्ति संभावना की                                         लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

छांदोग्य उपनिषद में एक कथा है श्वेतकेतु की। उसके पिता उसे उपदेश दे रहे हैं, पास ही एक बरगद का वृक्ष है, उसके नीचे कुछ फल गिरे हुए हैं। पिता ने बेटे को एक फल देते हुए पूछा, “बेटा यह क्या है?”

“यह तो बरगद का फल है”, बेटे ने कहा।



“इसे तोड़ो, इसके भीतर क्या है?”

“इसके भीतर बहुत सारे बीज हैं पिताजी”।

पिता ने बेटे को एक बीज देते हुए कहा, “इसे तोड़ो, इसके भीतर क्या है?”

श्वेतकेतु ने वह नन्हा सा बीच तोड़ा और ध्यान से देखकर कहा, “इसमें तो कुछ भी नहीं है”।

पिता ने कहा, “बस, जहाँ तुम कुछ नहीं देख रहे हो वहीं इतना बड़ा बरगद का पेड़ छुपा है। तमाम विषम-परिस्थितियों से जूझते और संघर्ष करते हुए यही न दिखाई देने वाला कुछ नहीं एक विशाल वृक्ष के रूप में परिवर्तित हो जायेगा। वत्स इसी बीज की तरह टूट जाने की जिद, आकांक्षा और संकल्प लेकर हर व्यक्ति अपनी अदृश्य संभावनाएं तलाशकर पूर्ण क्षमता और मौलिकता के साथ खुद को प्रकट कर सकता है”।

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी                                       धारावाहिक

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। इसके रोचक अंश हम जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी ग्यारहवीं किश्त है।)

 


(११)

परामर्शदाता नॉर्टन और मैजिस्ट्रेट बर्ली साहब

यदि नॉर्टन साहब थे नाटक के रचयिता, प्रधान अभिनेता और सूत्रधार तो मैजिस्ट्रेट बर्ली को कहा जा सकता है नाटककार का आश्रयदाता (patron)। बर्ली साहब थे शायद स्कॉच जाति के गौरव। उनका चेहरा स्कॉटलैंड का स्मारक चिह्न था। खूब गोरी, खूब लंबी, अति कृष, दीर्घ देहयष्टि पर छोटा सा सिर देख ऐसा लगता था जैसे अग्रभेदी आक्टोरलोनी के स्मारक पर छोटे-से आक्टोरलोनी बैठे हों, वहाँ क्लियोपेट्रा के स्तम्भ के शिखर पर एक पका नारियल रखा हो। उनके बाल थे धूसर वर्ण और स्कॉटलैंड की सारी ठंड और बर्फ उनके चेहरे के भाव पर जमी हुई थी। जो इतना दीर्घकाय हो उसकी बुद्धि भी तद्रूप होनी चाहिए, नहीं तो प्रकृति की मतिव्ययता के संबंध में संदेह होता है। किन्तु इस प्रसंग में, बर्ली की सृष्टि के समय, लगता है, प्रकृति देवी कुछ नमनी एवं अन्यमनस्क हो गयी थीं।  अंग्रेज़ कवि मरलो ने इस मितव्ययता का, छोटे-से भण्डार  में असीम धन (infinite riches in a little room)  कह वर्णन किया है  किन्तु बर्ली का दर्शन कवि के वर्णन से विपरीत भाव मन में जागता है – असीम भण्डार में क्षुद्र धन। सचमुच, इस दीर्घ देह में इतनी थोड़ी विद्याबुद्धि देख दु:ख होता था और इस तरह के अल्पसंख्यक शासनकर्ताओं द्वारा तीस कोटी भारतवासी शामिल हो रहे हैं यह याद कर अंग्रेजों की महिमा और ब्रिटिश प्रणाली पर प्रगाढ़ भक्ति उमड़ती थी। श्रीयुत व्योमकेश चक्रवर्ती द्वारा जिरह करते समय बर्ली साहब की विद्या की पोल खुली। इतने साल मैजिस्ट्रेटगिरी करने के बाद भी  यह निर्णय करने में उनका सिर घूम गया कि उन्होंने अपने कर कमलों में यह मुकदमा कब ग्रहण किया या कैसे मुकदमा ग्रहण किया जाता है, इस समस्या को सुलझाने में असमर्थ हो चक्रवर्ती साहब पर इसका भर दे साहब स्वयं निष्कृति पाने के लिए सचेष्ट हुए। अभी भी यह प्रश्न मुकदमे की तिजटिल समस्याओं में से एक गिना जाता है कि बर्ली साहब ने कब मुकदमा हाथ में लिया था।  चटर्जी महाशय के प्रति किये गये जिस करुण निवेदन का उल्लेख मैंने किया है उससे भी साहब की चिन्तनधारा का अनुमान लगाया जा सकता है। शुरू से ही वे नॉर्टन साहब के पाण्डित्य और वाग्विलास से मन्त्रमुग्ध हो उनके वश में हो गये थे। ऐसे विनीत भाव से नॉर्टन द्वारा प्रदर्शित पथ का अनुसरण करते, नॉर्टन की हाँ में हाँ मिलाते, नॉर्टन के हँसने से हँसते, नॉर्टन के कुपित होने पर कुपित होते कि यह सरल शिशुवत् आचरण देख कभी-कभी मन में प्रबल स्नेह और वात्सल्य का आविर्भाव होता। बल के स्वभाव में निरा लड़कपन था। उन्हें कभी भी मजिस्ट्रेट न मान सका, ऐसा लगता मानों स्कूल का छात्र हठात् स्कूल का शिक्षक बन शिक्षक के उच्च मंच पर चढ़ बैठा है। ऐसे ही वे कोर्ट का काम चलाते। कोई उनके साथ अप्रिय व्यवहार करता तो स्कूली शिक्षक की तरह शासन करते। हम में से यदि कुछ मुक़द्दमे के प्रहसन से विरक्त हो आपस में बातें करने लगते तो बर्ली साहब स्कूल मास्टर की तरह बिगड़ने लगते, उनकी बात न सुनने पर सबको खड़े हो जाने की आज्ञा देते, उसका भी तुरन्त पालन न किया तो प्रहरी को कहते हमें खड़ा कर देने के लिए। हम स्कूल मास्टर के इस रंग-ढंग को देखने के इतने आदी हो गये थे कि जब बर्ली और चटर्जी महाशय का झगड़ा खड़ा हुआ तो हम प्रति क्षण इस आशा में थे कि अब बैरिस्टर साहब को खड़े रहने का दण्ड मिलेगा। बर्ली साहब ने लेकिन उलटा रास्ता पकड़ा, चिल्लाते हुए बैठ जाइये, मि.चटर्जी कह अलीपुर स्कूल के इस नवागत उद्दण्ड छात्र को बिठा दिया। जैसे कोई-कोई मास्टर छात्र के किसी प्रश्न से या पढ़ाते समय अतिरिक्त व्याख्यान चाहने से खीज कर उसे डाँट देते हैं, बर्ली भी आसामी के वकील की आपत्ति पर खीज उसे डपट देते। कोई-कोई साक्षी नॉर्टन को परेशान करते नॉर्टन सिद्ध करना चाहते थे कि अमुक लेख अमुक आसामी के हस्ताक्षर हैं, साक्षी यदि कहते कि नहीं, यह तो ठीक उस लेख की तरह नहीं, फिर भी हो सकता है, कहा नहीं जा सकता बहुत से साक्षी इसी तरह का उत्तर देते थे तो नॉर्टन अधीर हो उठते। बक-झक कर, चिल्ला कर, डॉट-डपट कर किसी भी उपाय से अभीप्सित उत्तर उगलवाने की चेष्टा करते। उनका अन्तिम प्रश्न होता, “तुम क्या मानते हो, हाँ या ना?” साक्षी न हाँ कह पाते न ना, घुमा-फिरा कर बार-बार वही उत्तर देते। नॉर्टन को यह समझाने की चेष्टा करते कि उनका कोई भी विश्वास नहीं, वे सन्देह में झूल रहे हैं। किन्तु नॉर्टन वह उत्तर नहीं चाहते थे, बार-बार मेघगर्जना करते हुए उसी सांघातिक प्रश्न से साक्षी के सिर पर वज्राघात करते, “हाँ, तो फिर क्या राय है महाशय, आपकी?” नॉर्टन के क्रुद्ध होते ही बर्ली भी ऊपर से गरजते, "टोमारा क्या विश्वास है?" बेचारे साक्षी महाविपद् में पड़ जाते। उनका कोई विश्वास नहीं, लेकिन एक तरफ़ से मजिस्ट्रेट, दूसरी तरफ से नॉर्टन क्षुधित व्याघ्र की तरह उनकी बोटी-बोटी अलग कर अमूल्य अप्राप्य विश्वास बाहर निकलवाने को तत्पर हो दोनों तरफ़ से भीषण गर्जन कर रहे हैं। बहुधा विश्वास ज़ाहिर न होता, चकरायी बुद्धि और पसीने से तर साक्षी उस यन्त्रणा स्थल से अपने प्राण बचा भाग खड़े होते। कोई-कोई प्राणों को ही विश्वास से प्रियतर मान नॉर्टन साहब के चरण-कमलों में झूठे विश्वास का उपहार चढ़ा बच निकलते, नॉर्टन भी अति सन्तुष्ट हो बाकी जिरह स्नेहसहित सम्पन्न करते। ऐसे परामर्शदाता के साथ आ मिले ऐसे मजिस्ट्रेट तभी तो मुक़द्दमे ने और भी अधिक नाटकीय रूप धारण कर लिया था।

(क्रमश:, आगे अगले अंक में)

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अपने सुझाव (suggestions) दें, आपको सूतांजली कैसी लगी और क्यों? आप अँग्रेजी में भी लिख सकते हैं।

शुक्रवार, 1 अक्टूबर 2021

सूतांजली, अक्तूबर 2021

सूतांजली

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वर्ष : ०५ * अंक : ०३                     🔊(२६.३२)                                                  अक्तूबर   * २०२१

हमें महापुरुषों के गुणों को ही ग्रहण करना चाहिए,

उनके दोष नहीं देखना चाहिए; क्योंकि

पहाड़ का गड्ढा भी

मैदान से बहुत ऊँचा होता है।

(स्वामी विवेकानंद)

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क्या गाँधी से दूर रहा जा सकता है? 🔉 (६.१२)                                   मैंने पढ़ा

(किसी भी वाद-विवाद का कोई अंत नहीं होता। अत: जब कभी कहीं कोई गाँधी की आलोचना करता, मेरे पास चुप रहने के अलावा और कोई चारा नहीं रहता। मैं जानता हूँ कि वह गाँधी के बारे में नहीं जानता। सोनाली के लेख को पढ़ने से संतोष हुआ, ऐसा सोचने वाला मैं अकेला नहीं हूँ, और भी हैं। किसी की आलोचना करनी है, जरूर कीजिये लेकिन उसे जानने के बाद, समझने के बाद, पढ़ने का बाद। आधे-अधूरे ज्ञान से नहीं, सुनी-सुनाई बातों से नहीं। प्रस्तुत भावुक आलेख की लेखिका हैं सोनाली जोशी जिसका अनुवाद किया है उपमा ने।)



मेरा छोटा सा मस्तिष्क, कभी भी समाज की बड़ी-बड़ी धारणाओं, वादों, आदर्शों, समूहों और शाखाओं को नहीं समझ सका। मुझे वे सारी चीजें बहुत उलझी हुई लगीं। मेरा मानना है कि सरलता वो है जिसे सहज ही समझा सके। और इसी तरह मैंने बापू को समझा। गाँधीजी के विचारों की  शुद्धता और सरलता बड़ी असाधारण थी। गाँधी को समझने के लिए मुझे किताबी ज्ञान की जरूरत महसूस नहीं हुई। उनका संदेश खुद उनका जीवन था। उन्होंने वही सिखाया, जिसका उन्होंने अनुकरण किया।

साबरमती आश्रम में एक सूक्ति ने मेरा ध्यान आकर्षित किया। यह सूक्ति मार्टिन लूथर किंग की थी – “बौद्धिक और नैतिक संतुष्टि जो बेंथम और मिल के उपयोगितावाद में, मार्क्स और लेनिन के क्रांतिकारी सिद्धांतों में, होब्स के सामाजिक समझौते के सिद्धान्त में, रूसो के प्रकृति की ओर लौटो वाले आशावाद में, नित्शे के अतिमानवीय दर्शन में नहीं मिल सकी, उसे मैंने गाँधी के अहिंसावादी दर्शन में पा लिया।”

यकीनन गाँधीजी चर्चा का सार्वभौमिक विषय है। दुनिया में दो तरह के लोग हैं, एक वे जो सचमुच गाँधी की नीतियों और उनके बताए रस्तों पर चर्चा करना चाहते हैं और दूसरे वे जो सिर्फ उनकी आलोचना करना चाहते हैं। ये आलोचक बड़े पढे-लिखे लोग हैं। विश्वविख्यात हैं, वे देश के पिछड़े और शोषित इलाकों की दशा सुधारने के लिए विदेशों में घूमते हैं। ऊँचे ओहदों पर बैठे हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे भी हैं, जो सकारात्मक और नकारात्मक आलोचना में अन्तर तक नहीं कर पाते हैं। तारीख का हवाला देते हुए कहते हैं, १९२० में गाँधी ने इस मसले पर ऐसा कहा, वैसा कहा

पहले मैं भी ऐसी चर्चाओं को बढ़ाने की कोशिश करती थी, लेकिन अब ये सब खत्म कर दिया है। जब कभी उन की आलोचना सुनती हूँ तो मैं बहस से किनारा कर लेती हूँ। क्योंकि मुझे पता है ये लोग नहीं जानते कि गाँधी क्या थे? वे अकेले ऐसे थे, जो जिंदगी और मानवता के प्रति अपने प्रयोगों और समझ के द्वारा हर दिन विकसित होते थे। वे हर दिन सीखते थे। हर दिन बढ़ते थे। हर दिन उन्नति करते और हर दिन जागते थे। वे स्वयं को जिंदगी के हर क्षण सुधारते थे। फिर चाहे वो व्यक्तिगत जीवन हो या वैवाहिक जीवन। सामाजिक जीवन हो या राजनीतिक जीवन। इसीलिए ८०-९० साल पहले गाँधी के कहे गए शब्दों को उनके आखरी शब्द मान लेना गाँधी नहीं, स्वयं अपनी बौद्धिक क्षमता को सीमित करने जैसा होगा।  वस्तुत: गाँधी को असामाजिक घोषित करने के प्रयास उन्हें और अधिक सामाजिक बनाते हैं। शांति की आवश्यकता और तलाश हमें गाँधी के और निकट ले जाती है। गाँधी अंत तक सामाजिक थे, सामाजिक हैं और सामाजिक रहेंगे। डॉ. किंग की सूक्ति के साथ अपनी बात खत्म करना चाहूंगी, यदि मानवता, विकास के लिए है, तो गाँधी से दूर नहीं रहा जा सकता। वे विश्व शांति और सद्भाव से भरी मानवीय दृष्टि से प्रेरित थे। इसी भाव से वे सोचते थे और कार्य करते थे। हम केवल अपनी रिस्क पर ही उन्हें अनदेखा कर सकते हैं

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मैंने शायरी को देखा है    🔉(६.५८)                                              मेरे अनुभव

आपने शायरी सुनी होगी, आपने शायरी पढ़ी भी होगी, हो सकता है अपने शायरी लिखी भी हो। लेकिन जनाब, क्या अपने कभी शायरी देखी भी है? हाँ, मैंने देखी है। अकस्मात, हठात, अनजाने में, शायरी झूमते हुए मेरे सामने आई और मेरे दिल, दिमाग को हतप्रभ कर निकल गई। शायद आप जानते होंगे, आँखें देखने का काम नहीं करती। आँखें तो खिड़की मात्र हैं, वे तो सिर्फ  चंद लकीरों को, कुछ रौशनी को हमारे मस्तिष्क तक भेजती हैं। यह तो हमारा मस्तिष्क है जो इन्हें पढ़ता है। साक्षर मस्तिष्क उन लकीरों को शब्दों  में परिवर्तित कर उन्हें पढ़ लेते हैं, लेकिन  शिक्षित मस्तिष्क ही उनका विश्लेषण कर इसका अर्थ निकाल पाते हैं। जब खुदा इन सबका संयोग बैठाता है तब जाकर शायरी के दर्शन होते हैं। दैव-योग से हमें यह अमूल्य योग प्राप्त हुआ और हमें शायरी के साक्षात दर्शन हुए।  

          हुआ यूँ कि लंबे समय से इंतज़ार के पश्चात हम श्रीअरविंद आश्रम – दिल्ली पहुंचे और अचानक फिर से एक संयोग बना और दो दिन की यात्रा पर इंदौर पहुँच गए। वहाँ जाने का मकसद था अपने एक निकट के अति वरिष्ठ नागरिक से मिलना। अपने जीवन के 90 से ज्यादा शरद देख चुके थे। केवल उन्हीं से मिलना था इसलिए एक ही दिन का कार्यक्रम था। लेकिन आश्रम की दीदी’, जिनसे मैं जितना स्नेह रखता हूँ उससे ज्यादा उनका सम्मान करता हूँ, ने एक आज्ञा दी, “तुम्हें एक सप्ताह के लिए जाना है”। मैं दुविधा में पड़ गया। न मैं इतने दिन के लिए जाना चाहता था न ही उनकी आज्ञा का उल्लंघन करना चाहता था। रात भर नींद नहीं आई, दुविधा में पड़ा रहा। असमंजस में टिकिट भी नहीं करवाई। सुबह-सुबह उनके दरबार में पहुंचा, दरख्वास्त की, “कृपया अपनी आज्ञा में थोड़ा परिवर्तन करें, तब मैं टिकट बनवाऊँ।” सुनवाई हुई और उन्होंने मुझे पूरी छूट दे दी, “जैसा आपलोग चाहते हैं वैसा ही कर लीजिये।” राहत की साँस ली और अपने कार्यक्रम को 1 से बढ़ा कर 2 दिन का कर लिया।


       
पहला दिन तो सबों से मिलने में निकल गया। दूसरे दिन क्या करूँ? दीदी ने एक नंबर दिया था और कहा था कि समय मिले तो इनसे मिल लीजिएगा नहीं तो कम-से-कम बात तो जरूर कर लीजिएगा। मैंने भी कहा तो यही कि अगर समय मिला और हमारे नजदीक ही होंगी तो मिल लूँगा। फोन मिलाया, बात हुई। बात हुई, तो मिलने कि इच्छा भी हुई। कहाँ है, कितनी दूर है, यह समझ न सका तो पता-ठिकाना पूछा और बाद में फिर फोन करता हूँ कह कर बात समाप्त कर दी। पूछ-ताछ की तो बताया गया कि पास ही है’, कोई दिक्कत नहीं है। बाद में पता चला कि दूर ही नहीं भीड़ भरे इलाके में भी है। जिन्होंने बताया था वे आधे रास्ते तक ही छोड़ने को तैयार हुए। लेकिन तब तक कार्यक्रम बन चुका था, पीछे हटना संभव नहीं था। पूछने पर बताया आधी-पौन घंटे से ज्यादा नहीं लगेगी’,  क्या मालूम था कि समय ज्यादा लगना था, विधाता को तो मुझे शायरी के दर्शन कराने थे।

          औपचारिकता निभाने के बाद मैंने दिल्ली आश्रम का संदेश निवेदित किया और तत्पश्चात बोला, अब आज्ञा दें”। बोलते ही एक झिड़की सी मिली, “अरे! अभी कैसे!” और फिर! एक-के-बाद-एक परतें खुलने लगीं। जैसे-जैसे परतें उतरने लगीं – रोमांचित होना, रोंगटों का खड़ा होना और अश्रुपात – इधर भी उधर भी - होने लगे। न वे बोल रही थीं, न हम सुन रहे थे। विधाता ही बोल रहा था, विधाता ही सुन रहा था।

          हमारे सामने दो टेलीग्राम रखे गए। वाणी बोलने लगी,

“एक विशेष कार्यक्रम में ’, पांडिचेरी से एक अतिविशिष्ट सज्जन का आना तय हुआ। उनकी रजामंदी भी आ गई। उसी अनुसार सबों को सूचित भी किया गया।  कार्यक्रम, कार्यक्रम न रह  उत्सव बन गया। सबों के पैरों में जैसे घुँघरू बंध गए। बिना किसी थकावट की अनुभूति के कार्यक्रम  की तैयारी होने लगी। लेकिन, अचानक, दो दिन पहले, उनका टेलीग्राम आया मैं नहीं आ सकूँगा - न। ऐसा लगा जैसे बिजली गिरी। किंकर्त्यव-विमूढ़ सी बैठी रह गई। आँखों से अविरल धारा बह चली। फरियाद की माँ, तूने ये क्या किया? सब कुछ तुझ पर है, जैसे तेरी इच्छा। और किसी को कुछ नहीं कहा। लोग यह समझ रहे थे कुछ हुआ है लेकिन क्या? किसी में पूछने का साहस नहीं जुट रहा था। सब माँ से प्रार्थना कर रहे थे। दूसरे दिन और एक टेलीग्राम आया, लिखा था “’ जा रहा है – माँ”। मैं सुन्न हो गई। आँखें बंद हो गईं। गालों से आँसू लुढ़कने लगे। कुछ ही देर बाद और एक टेलीग्राम आया! सहमते हुए लेकिन पूरे आत्म-विश्वास के साथ उसे खोला। मैं पहुँच रहा हूँ - न

खुदी को कर बुलंद इतना, कि हर तकदीर से पहले,

                                      खुदा बंदे से खुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है।

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सज्जनता   🔉(३.०६)                                               लघु कहानी - जो सिखाती है जीना

सेना के एक अधिकारी लड़ाई के समय शिविर के कुछ सैनिकों के साथ घोड़ों के लिये घास एकत्र करने निकले। एक गाँव के किसान को उन्होंने आदेश दिया, “चल कर बताओ कि इस गाँव में किस खेत की फसल सबसे अच्छी है”। विवश होकर किसान को उन सैनिकों के साथ जाना पड़ा। खेत खड़ी फसल से लहलहा रहे थे। बहुत उत्तम फसल थी। सैनिक चाहते थे कि उन लहलहाते खेतों की  फसल काट लें, लेकिन किसान कहता चला जा रहा था, “जी यहाँ नहीं, कुछ और आगे चलिये, इससे भी अच्छी फसल आपको दिखलाऊंगा”। धीरे-धीरे किसान सैनिकों को गाँव की सीमा के खेत तक ले गया। वहाँ का खेत दिखला कर बोला, “महाशय, इस गाँव में इस खेत की फसल सबसे अच्छी है”। सैनिकों ने उस खेत की पूरी फसल उखाड़ कर, गट्ठे बाँध, घोड़ों पर लाद दी। सैनिक अधिकारी ने वह फसल देख, डपट कर किसान से कहाँ, “बेकार में तुम हमें इतनी दूर ले आया, इससे अच्छी-अच्छी फसलें तो हम पीछे छोड़ आए और तुम उत्तम बता कर हमें बेवकूफ बना रहा है। बता, इस चाल के पीछे तेरी मंशा क्या है”?

किसान ने हाथ जोड़ कर, विनीत लेकिन स्पष्ट स्वर में कहा, “जी, सच बात तो यह है कि मैं जानता था कि आप खेत के मालिक की फसल का मूल्य तो देंगे नहीं। मैं किसी दूसरे का खेत दिखला कर उस बेचारे की हानि कैसे करवाता। पहली बात तो यह है कि यह खेत मेरा है और दूसरी यह कि आप भी मानेंगे कि मेरे लिए तो अपने खेत की फसल ही सबसे सबसे अच्छी है”।

किसान की बात सुन कर वह सैनिक अधिकारी लज्जित हो उठा। उसका किसान के प्रति मनोभाव तुरंत बदल गया। घोड़े से उतर कर उसने अपनी जेब से एक थैली निकाली, किसान के हाथों में थमाता हुआ बोला,आज अचानक सज्जनता का यह पाठ पढ़ा कर तुमने मुझ पर बहुत बड़ा उपकार किया भाई। युद्ध के इस नारकीय दलदल में  फँसे हुए मुझको हाथ देकर उबरने की कीमत तो नहीं चुका पाऊँगा, लेकिन तुम्हारी फसल की भरपाई के लिए मेरी इस छोटी-सी भेंट को कहीं अस्वीकार न कर देना..........”

(अग्निशिखा से)

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मेरी नहीं सबकी माँ      🔉 ३.०५)                                             मैंने पढ़ा                         

यह कैसी माँ है?

मैंने समझा मेरी माँ है। परंतु जो मिलता है, कहता है – मेरी माँ है, मेरी माँ है। यह भी कोई बात हुई?

यदि इस तरह लाखों-करोड़ों की माँ हुई तो मेरे हिस्से में क्या आयेगा? टॉफी का सारा डिब्बा खुलने पर बस एक टॉफी! गुस्सा भी आता है, पर कुछ बन नहीं पाता।

मैं ने एक दिन ठानी कि माँ से पूछ ही लूँ -  तू मेरी माँ है कि सबकी माँ है? जब गया तो जाते ही जो चाहता था वह मिल गया और पूछना भूल गया। अच्छा! मैं ने सोचा अबकी बार पूछूँगा। अबकी बार अवश्य पूछूंगा। पर जाऊँ तो जो माँगू मिल जाए। जो चाहूँ मिल जाए।

          बरसों बीत गए और बात धरी-की-धरी रह गई। जब देखूँ लाइन लगी हुई है। क्यू में लोग जा रहे हैं और ओठों पर – माँ रटन लगी है। और वापस आएं तो ऐसे प्रसन्न – संतुष्ट जैसे सब कुछ मिल गया। यह देख-देख कर मेरा खून रोजाना इतना बनता नहीं था जितना सूख जाता था। बरसों फिर बीत गए। अबकी बार सोचा कि चाहे कुछ मिल जाये फिर भी पूछ कर ही छोड़ूँगा। रुमाल में गाँठ  बाँध ली और लाल-पीला होकर जीने पर चढ़ा। रुमाल की गाँठ तो जेब में ही रह गई। गुस्से ने प्राणों में जगह ले ली।

माँ ने पूछ बेटा क्या चाहिए’?

मैंने भुनभुनाकर जवाब दिया, मुझे कुछ नहीं चाहिए

माँ ने मुस्कुराकर पूछा, तब तो तुम्हें सब कुछ मिल गया

मैं ने भुनभुनाकर पूछा, पर तुम दूसरों की माँ क्यों बनती हो?’

माँ प्यार से बोली, ताकि उनको भी तुम्हारी तरह सब कुछ मिल सके और तुमसे छीना-झपटी न करें

          जब मैं वापस आया तो सोचने लगा कि कहीं ठगा तो नहीं गया। जब मुझे सब-कुछ मिल गया तो दूसरों को भी सब-कुछ मिल गया, ठीक है। सब प्रसन्न होंगे तभी तो मैं भी प्रसन्न रह सकूँगा।

वाह री  माँ।

तू तो माँ ही माँ है।

मेरी नहीं, सबकी माँ है!









(आप माँ को अपनी श्रद्धा से चाहे जिस रूप में देख सकते हैं। स्वामी रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानन्द ने काली के रूप में देखा तो श्री सुरेन्द्र नाथ जौहर ने श्रीमाँ के रूप में। श्री अरविंद आश्रम-दिल्ली शाखा से प्रकाशित पत्रिका कर्मधारा से।)

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कारावास की कहानी-श्री अरविंद की जुबानी   🔉 (६.५९)                     धारावाहिक

(पांडिचेरी आने के पहले श्री अरविंद कुछ समय अंग्रेजों की जेल में थे। जेल के इस जीवन का श्री अरविंद ने कारावास की कहानी के नाम से रोचक, सारगर्भित एवं पठनीय वर्णन किया है। इसके रोचक अंश हम जनवरी २०२१ से एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहे हैं। इसी कड़ी में यहाँ इसकी दसवीं किश्त है।)

 


(१०)

हमारे नाटक के शेक्सपीयर 

हमारे नाटक के शेक्सपीयर थे नॉर्टन साहब। किन्तु शेक्सपीयर और नॉर्टन साहब में मैंने एक प्रभेद देखा। संगृहीत उपादान का कुछ अंश शेक्सपीयर कहीं-कहीं छोड़ भी देते थे, पर नॉर्टन साहब अच्छा-बुरा, सत्य-मिथ्या, संलग्न-असंलग्न, अनोर्णियान महतो माहियान जो पाते, एक भी न छोड़ते, तिस पर निजी कल्पनासृष्ट प्रचुर सुझाव, अनुमान, परिकल्पना जुटा उन्होंने इतना सुंदर कथानक रचा कि शेक्सपीयर, डेफ़ो इत्यादि सर्वश्रेष्ठ कवि और उपन्यासकार इस महाप्रभु के आगे मात खा गए। आलोचक कह सकते हैं कि जैसे फ़ौलस्टाफ के होटल के बिल में एक आने की रोटी और असंख्य गैलन शराब का समावेश था उसी तरह नॉर्टन साहब के प्लॉट में एक रत्ती प्रमाण के साथ दस मन अनुमान और सुझाव थे। किन्तु आलोचक भी प्लॉट की परिपाटी और रचना-कौशल की प्रशंसा करने को बाध्य होगा। नॉर्टन साहब ने इस नाटक के नायक  के रूप में मुझे ही पसंद किया, यह देख मैं समधिक प्रसन्न हुआ। जिसे मिल्टन के “Paradise Lost” का शैतान, वैसे ही मैं था नॉर्टन साहब के प्लॉट का कल्पनाप्रभूत महाविद्रोह का केंद्र स्वरूप, असाधारण तीक्ष्णबुद्धि-सम्पन्न, क्षमतावान और प्रतापशील ढीठ बुरा आदमी (बोल्ड बैड मैन)। मैं ही था राष्ट्रीय आंदोलन का आदि और अंत, स्रष्टा और त्राता, ब्रिटिश साम्राज्य का संहार-प्रयासी। उत्कृष्ट और तेजस्वी अँग्रेजी लेख देखते ही नॉर्टन साहब उछल पड़ते और उच्च स्वर में  कहते – अरविंद घोष। आंदोलन के जितने भी वैध, अवैध, सुशृंखलित अंग या अप्रत्याशित फल – वे सभी अरविंद घोष की सृष्टि हैं, और क्योंकि वे अरविंद की सृष्टि हैं इसलिये वैध होने पर भी उसमें अवैध अभिसंधि गुप्त रूप से निहित है। शायद उनका यह विश्वास था कि अगर मैं न पकड़ा गया तो दो साल के अंदर-अंदर अंग्रेजों के भारतीय साम्राज्य का ध्वंस हो जाएगा। किसी फटे कागज के टुकड़े पर मेरा नाम पाते ही नॉर्टन साहब खूब खुश होते और इस परम मूल्यवान प्रमाण को मैजिस्ट्रेट के श्री चरणों में सादर समर्पित करते। अफसोस है, कि मैं अवतार बन कर नहीं जन्मा, नहीं तो मेरे प्रति उस समय की उनकी इतनी भक्ति और मेरे अनवरत ध्यान से नॉर्टन साहब निश्चित ही उस समय मुक्ति पा जाते जिससे हमारी कारावास की अवधि और गवर्नमेंट का अर्थव्यय दोनों की ही बचत होती। सेशन्स अदालत द्वारा मुझे निर्दोष प्रमाणित किये जाने से  नॉर्टन-रचित प्लॉट की सब श्री और गौरव नष्ट हो गया। बेरसिक बीचक्राफ्ट हैमलेट नाटक से हैमलेट को अलग करके बीसवीं सदी के श्रेष्ठ काव्य की हतश्री  कर गए। समालोचक को यदि काव्य-परिवर्तन का अधिकार दे दिया जाए तो भला क्यों न होगी ऐसी दुर्दशा? नॉर्टन साहब को एक और दु:ख था, कुछ गवाह भी ऐसे बेरसिक थे की उन्होंने भी उनके रचित प्लॉट के अनुसार गवाही देने से साफ इंकार कर दिया। नॉर्टन साहब गुस्से से लाल पीले हो जाते, सिंह गर्जना से उनके प्राण कंपा उन्हें धमकाते। जिसे कवि को स्वरचित शब्द के अन्यथा प्रकाशन पर और सूत्रधार को अपने दिये गए निर्देशों के विरुद्ध अभिनेता की आवृत्ति, स्वर या अंगभंगिमा पर न्यायसंगत और अदमनीय क्रोध आता, वैसा ही क्रोध आता था नॉर्टन साहब को। बैरिस्टर भुवन चटर्जी के साथ हुए संघर्ष का कारण यही सात्विक क्रोध ही था। चटर्जी महाशय के जितना रसायनभिज्ञ पुरुष तो कोई नहीं देखा। उन्हें रत्ती भर भी समय-असमय का ज्ञान नहीं था। नॉर्टन साहब जब संलग्न-असंलग्न का विचार न कर केवल कवित्व की खातिर जिस-तिस प्रमाण को घुसेड़ते, तब चटर्जी महाशय खड़े हो असंलग्न या अमान्य कह आपत्ति करते। वे समझ न सके कि ये साक्षी इसलिए नहीं पेश किये जा रहे हैं कि ये संलग्न या कानून-सम्मत हैं वरन इसलिये कि नॉर्टनकृत नाटक में शायद उपयोगी हों। इस असंगत व्यवहार से नॉर्टन ही क्यों बर्ली  साहब तक झुँझला उठते। एक बार बर्ली साहब ने चटर्जी साहब को बड़े करुण शब्दों में कहा था, “श्रीमान चटर्जी, आपके आने से पहले हम निर्विघ्न मुकदमा चला रहे थे। सच तो यह है, नाटक की रचना के समय बात-बात पर आपत्ति उठाने से नाटक भी आगे नहीं बढ़ता और दर्शकों को भी मजा नहीं आता।

(क्रमश:, आगे अगले अंक में)

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सूतांजली सितंबर (द्वितीय) 2026, दर्शन - तब और अब

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